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Rajim Kumbh Kalp 2024: वनवास काल में राजिम आए थे भगवान श्रीराम, माता सीता ने यहां शिवलिंग बनाकर की थी पूजा

Rajim Kumbh Kalp 2024: छत्‍तीसगढ़ की तीर्थनगरी राजिम में प्रवेश करते ही सड़क की चौड़ाई बढ़ जाती है। रोड के डिवाइडर में मिट्टी भरी हुई है, हरियाली लाए जाने की प्रारंभिक तैयारी होती दिख रही है। महानदी पर बने सेतु से नीचे आस्था की त्रिवेणी में मीलों तक फैले राजिम कुंभ के रंगबिरंगे शामियाने, लहराते सनातनी भगवा झंडे, जलराशि के बीच कलाकृतियां मन मोहती हैं।

लक्ष्मण झूले के पास पहुंचते ही भजनों की सुमुधर आवाज सुनाई देती है। अलग-अलग घाटों पर पुण्य स्नान करते लोग दिखाई देते हैं। खेल- खिलौनों की दुकान लगाने वालों की वेशभूषा बताती है कि वे देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हुए हैं। राजीव लोचन मंदिर और महादेव मंदिर को जोड़ने वाले लक्ष्मण झूले (सेतु) से गुजरते बालक अपने पालकों से नीचे मेलेस्थल पर सजी दुकानों की ओर जाने की मनुहार करते हैं।

नीचे रेत की बोरियों से तैयार किए गए अस्थाई घाटों पर लोग पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं। गर्म हवा से भरे विशालकाय गुब्बारों में राजनेताओं की तस्वीरें से आकाश भरा हुआ है। नीचे आधुनिक शामियानों में (डोम) लगे बड़े- बड़े कूलर बाहर की गर्मी से राहत देते हैं। दूर- दराज से आए लोग पुण्य स्नान के बाद मेले में घूम-घूम कर थकते हैं तो उन्हें इन शामियानों में बिछी कुर्सियां आराम देती हैं।

राजीव लोचन मंदिर वाले तट पर पुलिस का कंट्रोल रूम 24 घंटे काम करता है। यहां वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मेले में गुम होने वाले लोगों को उनके परिवारों से मिलाते हैं। चप्पे- चप्पे में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखते हैं। अपराधियों पर निगरानी रखते हैं, विघ्न संतोषियों पर तत्काल कार्रवाई करते हैं। हर घंटे सैकड़ों की संख्या में सफाईकर्मी मेला परिसर की साफ- सफाई में जुटे हुए हैं।

हर 10 से 20 मीटर में पाइप लाइन पर ऊंचाई में लगाई गई पानी की टोंटी साफ- सुथरा पानी उपलब्ध कराती है। भक्तिन माता राजिम समिति की ओर से मेला स्थल पर विशाल भंडारे का आयोजन भी नियमित किया गया है। राइस मिलर्स के संगठन भी मेले में आए लोगों को भोजन देने की तैयारी में जुटे हुए हैं।

परिसर में जगह-जगह शौचालय लोगों को उनकी प्राकृतिक जरूरतों को पूरा करने में मदद कर रहे हैं। भव्यता के बीच मेलास्थल की पवित्रता मन मोह ले रही है। मेला 24 फरवरी से शुरू हुआ है। मेला आठ मार्च तक चलेगा। इसमें देश भर के संतों का समागम होना है।

नदी में जगह -जगह बांध बनाकर डाइवर्ट किया गया पानी
छत्तीसगढ़ के प्रयागराज की मान्यता प्राप्त राजिम में प्रशासन की ओर से नदी के जल को विभिन्न घाटों में डाइवर्ट करने के लिए मीलों लंबा चैनल भी बनाया गया है। रेत की बोरियों से बहते जल की धारा मोड़कर स्नान करने की व्यवस्था भी की गई। घाटों की मरम्मत कर उन्हें नया रूप दिया गया है। तीन नदियों के संगम में हो रहे आयोजनों से यहां भक्ति और आस्था देखी जा रही है।

भगवान श्रीराम के पड़ाव के पदचिन्‍हों की पावन भूमि
मान्यता के अनुसार श्रीराम वनवास काल में इस पुण्य भूमि और पवित्र सरिता महानदी के तट पर आए थे। सीता माता ने यहां पर भी शिवलिंग की स्थापना कर अभिषेक किया। बाद में स्थानीय राजाओं ने समय-समय पर यहां देवालयों, शिवालयों का निर्माण कराया। आस-पास की परिधि के कई किलोमीटर के दायरे में प्रसिद्ध महादेवों के शिवालय हैं।

सतयुग से जिस पुण्य भूमि का वर्णन धार्मिक ग्रंथों में मिलता है उसके प्रमाण भी यहां जहां तहां उपस्थित हैं। पूरे मेला क्षेत्र में श्रीराम के वनवास से जुड़े प्रसंगों पर आधारित प्रमाण भी दिखते हैं। मेला क्षेत्र में वह कंदमूल भी दिखता है जिसने बेचने आया दुकानदार दावा करता है कि श्रीराम ने अपने वनवास काल में इसी तरह के कंदमूल का सेवन किया था। महादेव मंदिर के पास और राजीव लोचन मंदिर के प्रवेश द्वार पर तो पानी में तैरनेवाली शिला भी मेलार्थियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई दिखी।

महानदी, पैरी और सोढुर नदी का संगम
राजिम में महानदी, पैरी व सोढुर नदी के संगम पर प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक 15 दिनों का मेला लगता है। संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव जी विराजमान हैं। दूसरे तट पर राजीव लोचन मंदिर है। मेले के प्रारंभ होने से पहले कल्पवाश होता है। पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा करते हैं। श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धूनी रमाते है।

101 किलोमीट की यात्रा का समापन पर माघ पूर्णिमा से कुंभ का आरंभ होता है। राजिम कुंभ में विभिन्न जगहों से हजारों साधु संतों का आगमन होगा। प्रतिवर्ष हजारों के संख्या में नागा साधू, संत आते हैं, तथा शाही स्नान तथा संत समागम में हिस्सा लेते हैं। लोगों में मान्यता है कि भगवान जगन्नाथपुरी जी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भगवान श्री राजीव लोचन तथा श्री कुलेश्वर नाथ के दर्शन नहीं कर लिए जाते।

कलकत्ता से पंडाल निर्माता, राजस्थान से खिलौना विक्रेता
मेले की भव्यता और राष्ट्रीयता का भाव वहां आने वाले पर्यटकों के साथ ही उसके निर्माण में लगे कारीगरों से भी निश्चित हो जाता है। मीलों फैले मेला परिसर में शामियानों के निर्माण में जहां बंगाल से आए कारीगर लगे हुए हैं। वहीं मेले स्थल में राजस्थान से यहां आकर खिलौने बेचने वाले समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में दिखते हैं। पूछने पर बताते हैं कि वह अपने परिवारों के साथ देश भर के अलग-अलग स्थानों पर लगने वाले बड़े मेलों में जाते हैं।