छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम नगरी राजिम में आयोजित राजिम कुम्भ कल्प 2026 इस वर्ष आस्था, संस्कृति और सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं के साथ नई ऊंचाइयों को स्पर्श कर रहा है। पंचकोशी धाम की आध्यात्मिक झलक, जगमगाते घाट, संतों का समागम और स्वच्छता की अनुकरणीय व्यवस्था ने इस महापर्व को विशेष आकर्षण प्रदान किया है। राज्य शासन और जिला प्रशासन द्वारा किए गए सुनियोजित प्रयासों के परिणामस्वरूप मेला परिसर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और प्रेरणादायी वातावरण प्रस्तुत कर रहा है।
मुख्य मंच की भव्यता ने खींचा ध्यान
राजिम कुम्भ कल्प के मुख्य मंच को इस वर्ष विशेष रूप से आकर्षक स्वरूप दिया गया है। लगभग 60 फीट चौड़े और 80 फीट लंबे इस विशाल मंच की पृष्ठभूमि में पंचकोशी धाम के प्रमुख मंदिरों की सजीव झलक श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति करा रही है। भगवान श्री राजीवलोचन एवं कुलेश्वरनाथ महादेव के साथ पटेश्वरनाथ (पटेवा), चम्पकेश्वरनाथ (चम्पारण), ब्रह्मकेश्वरनाथ (ब्रह्मनी), फणीकेश्वरनाथ (फिंगेश्वर) और कोपेश्वरनाथ (कोपरा) के मंदिरों की प्रतिकृतियां बांस और कपड़े से निर्मित की गई हैं। पारंपरिक शिल्प और आधुनिक साज-सज्जा का यह संतुलित समन्वय मंच को विशिष्ट गरिमा प्रदान कर रहा है।
मंच पर स्थापित एलईडी स्क्रीन के माध्यम से कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे दूर बैठे दर्शक भी प्रस्तुति का आनंद ले पा रहे हैं। राज्यस्तरीय इस मंच की भव्यता और कलात्मक प्रस्तुति आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ा रही है।

स्वच्छता व्यवस्था बनी प्रेरणा
राजिम कुम्भ कल्प 2026 में स्वच्छता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। पूरे मेला क्षेत्र में स्थान-स्थान पर डस्टबीन की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, ताकि कागज, रैपर, पॉलीथीन और प्लास्टिक की बोतलें इधर-उधर न फैलें। सफाई कर्मियों द्वारा नियमित रूप से कचरा संग्रहण और निष्पादन किया जा रहा है, जिससे मेला परिसर स्वच्छ और सुव्यवस्थित बना हुआ है।
‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ की संकल्पना का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। धार्मिक नगरी में बड़ी संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु भी स्वच्छता के प्रति जागरूक दिखाई दे रहे हैं और प्रशासन के प्रयासों में सहयोग कर रहे हैं। सामूहिक सहभागिता के कारण मेला क्षेत्र में स्वच्छ वातावरण बना हुआ है, जो अन्य आयोजनों के लिए भी प्रेरणास्रोत है।
जगमगाते घाट और सुगम व्यवस्थाएं
नवीन मेला मैदान चौबेबांधा में नदी तट पर घाट निर्माण का कार्य जारी है। मेला प्रारंभ होने से पूर्व ऊंचे खंभों पर हाईमास्ट लाइटें स्थापित की गई हैं, जिनकी उज्ज्वल रोशनी से रात्रि के समय भी दिन जैसा दृश्य प्रतीत होता है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रकाश व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया है।
मेला भ्रमण के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं ने इन व्यवस्थाओं की सराहना की है। उनका कहना है कि वर्तमान में भी परिसर अत्यंत सुंदर और सुव्यवस्थित प्रतीत हो रहा है तथा आगामी आधारभूत संरचनाओं के पूर्ण होने पर यह क्षेत्र और अधिक आकर्षक रूप में विकसित होगा। प्रशासन द्वारा की जा रही दीर्घकालीन योजना इस धार्मिक नगरी को स्थायी रूप से सुसज्जित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

कलाकारों को मिल रहा सम्मान और अवसर
राजिम कुम्भ कल्प केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी सशक्त मंच है। प्रतिदिन सैकड़ों कलाकार मुख्य मंच, स्थानीय मंच और नदी मंच पर अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय प्रतिभाओं तक को मंच प्रदान कर उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर दिया जा रहा है।
प्रस्तुति के उपरांत कलाकारों को प्रमाण पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग द्वारा सांस्कृतिक रुचि रखने वाले शिक्षकों को मंच संचालन और अन्य व्यवस्थाओं से जोड़कर आयोजन में सक्रिय सहभागिता दी गई है। इससे आयोजन में अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा दोनों का संतुलन बना हुआ है।

संत समागम से आध्यात्मिक वातावरण
राजिम कुम्भ के संत समागम परिसर में देशभर से पहुंचे संत, महामंडलेश्वर और आचार्य विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं। संतों के सानिध्य में आध्यात्मिक वातावरण और अधिक सशक्त हो उठा है। श्रद्धालु सहज रूप से संतों के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।
विभिन्न अखाड़ों की सहभागिता और धार्मिक अनुष्ठानों की निरंतरता ने राजिम कुम्भ की पवित्रता को नई आभा प्रदान की है। आस्था, अनुशासन और सांस्कृतिक समन्वय का यह दृश्य राजिम को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिला रहा है।
समग्र रूप से राजिम कुम्भ कल्प 2026 आस्था, संस्कृति, स्वच्छता और सुव्यवस्थित प्रशासनिक प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक संरक्षण का भी सशक्त माध्यम बनकर उभर रहा है।