राजिम का त्रिवेणी संगमः छत्तीसगढ़ का प्रयाग, जहां पितरों के नाम होता है श्राद्ध-तर्पण

 

 

छत्तीसगढ़ का प्राचीन और पावन तीर्थ राजिम, महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित है। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पितृ तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। इसी वजह से राजिम को “छत्तीसगढ़ का प्रयाग” कहा जाता है। यहां हर वर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर माघी पुन्नी मेला और कुंभ का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं।

 

 

आमतौर पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की बात आते ही बिहार के गयाजी तीर्थ का स्मरण होता है, जिसकी मान्यता पुराणों में वर्णित है। लेकिन देश में कुछ अन्य तीर्थ भी हैं, जहां ये पितृ कर्म संपन्न किए जाते हैं। इन्हीं में छत्तीसगढ़ का राजिम तीर्थ भी प्रमुख है। तीन नदियों के संगम के कारण इस स्थल को प्रयाग जैसी पवित्रता प्राप्त है। माघ मास में यहां विशाल मेला लगता है और श्राद्ध पक्ष में बड़ी संख्या में लोग अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं।

 

 

राजिम में भी लगता है कुंभ

हरिद्वार और प्रयाग की तरह राजिम में भी कुंभ का आयोजन किया जाता है। यहां मृतकों की अस्थियों का विसर्जन भी किया जाता है। इस तीर्थ की धार्मिक महत्ता का बड़ा कारण यहां स्थित राजीव लोचन मंदिर है, जो भगवान श्रीराम को समर्पित है। इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी का मानते हैं। कहा जाता है कि माता कौशल्या श्रीराम को ‘राजीव नयन’ कहा करती थीं, क्योंकि उनके नेत्र कमल के समान थे।

 

दंडकारण्य से जुड़ी है राजिम की कथा

रामायण काल में राजिम क्षेत्र दंडकारण्य का हिस्सा था। लोककथाओं के अनुसार, इस क्षेत्र को पहले पद्मावती या पद्मपुर कहा जाता था। उस समय यहां राक्षसों का उत्पात था, जिससे क्षेत्र के राजा रत्नाकर यज्ञ और तपस्या के माध्यम से रक्षा करते थे। एक बार राक्षसों द्वारा यज्ञ भंग किए जाने से दुखी होकर राजा ने कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और यहां अवतार लेकर निवास करने का वरदान दिया। मान्यता है कि तभी भगवान विष्णु मूर्ति रूप में यहां स्थापित हुए और उनकी प्रतिमा पर बड़ी-बड़ी आंखें उभर आईं, जिससे वे राजीव लोचन कहलाए।

 

 

राजिम माई से जुड़ा नामकरण

राजिम तीर्थ का नाम एक भक्त महिला राजिम माई से जुड़ा है, जो जाति से तेलिन थीं और श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। लोककथा के अनुसार, उन्हें महानदी में बहती हुई श्रीराम शिला मिली, जिसे वे अपने घर ले आईं। इसके बाद उनके घर में सुख-समृद्धि आई। बाद में राजा को स्वप्न में भगवान विष्णु का आदेश हुआ और उन्होंने राजिम माई से वह शिला प्राप्त कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाई। उसी के बाद इस क्षेत्र को राजिम तीर्थ के नाम से जाना गया।

 

जगन्नाथ महाप्रभु से भी है गहरा संबंध

आज भी राजीव लोचन मंदिर परिसर में राजिम माई का मंदिर विराजमान है। इस लोककथा का उल्लेख लेखक धनंजय चोपड़ा ने अपनी पुस्तक भारत में कुंभ में भी किया है। मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक श्रद्धालु राजिम के दर्शन न कर लें। कहा जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान जगन्नाथ यहां पधारते हैं। इस दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पट बंद रहते हैं और श्रद्धालुओं को राजीव लोचन मंदिर में ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन होते हैं।

 

 

भगवान श्रीराम की उपस्थिति, जगन्नाथ महाप्रभु से जुड़ा विश्वास और त्रिवेणी संगम का पौराणिक महत्वकृइन सभी कारणों से राजिम तीर्थ श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। यही वजह है कि जैसे लोग गयाजी जाकर पितृ कर्म करते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ में राजिम को भी श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के प्रमुख तीर्थ के रूप में माना जाता है।