राजिम कुम्भ (कल्प) : आस्था, इतिहास और कथाओं का संगम

छत्तीसगढ़ के हृदय में स्थित राजिम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही विशेष कहानियों, लोकविश्वासों और ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत साक्ष्य है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा यह पावन नगर छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहलाता है। राजिम से जुड़ी कथाएँ इसे साधारण तीर्थ से कहीं अधिक अलौकिक बनाती हैं।

भगवान राजीव लोचन की कथा
राजिम की सबसे प्रसिद्ध कहानी भगवान राजीव लोचन से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु यहाँ कमलनयन स्वरूप में विराजमान हुए। कहा जाता है कि एक निषादराज ने अपनी गहरी श्रद्धा से भगवान को प्रसन्न किया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने इस पवित्र भूमि पर प्रकट होकर भक्त को दर्शन दिए। तभी से यह क्षेत्र राजीव लोचन धाम के नाम से जाना गया। मंदिर की स्थापत्य कला भी इस कथा की भव्यता को दर्शाती है, जहाँ पत्थरों पर उकेरी गई प्राचीन मूर्तियाँ आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।

कुलेश्वर महादेव और त्रिवेणी संगम
राजिम की दूसरी विशेष कहानी कुलेश्वर महादेव से जुड़ी है। यह मंदिर महानदी के बीच एक छोटे से द्वीप पर स्थित है। लोककथाओं के अनुसार, भगवान शिव स्वयं यहाँ प्रकट हुए थे और त्रिवेणी संगम की रक्षा का दायित्व संभाला। मान्यता है कि कुलेश्वर महादेव के दर्शन किए बिना राजिम यात्रा अधूरी मानी जाती है। महाशिवरात्रि और कुंभ कल्प के दौरान यहाँ विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।

राजिम कुंभ कल्प की परंपरा
राजिम से जुड़ी एक महत्वपूर्ण आधुनिक परंपरा है राजिम कुंभ कल्प। वर्ष 2005 से प्रारंभ हुआ यह आयोजन आज देशभर के संतों, नागा साधुओं और श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र बन चुका है। मान्यता है कि संगम में स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। संतों के प्रवचन, शाही स्नान और अखाड़ों की परंपरा ने राजिम को राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है।

लोमश ऋषि की तपोभूमि
पुराणों के अनुसार, राजिम क्षेत्र लोमश ऋषि की तपोभूमि रहा है। कहा जाता है कि ऋषि लोमश ने यहाँ वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे यह भूमि सिद्ध क्षेत्र बन गई। स्थानीय जनमान्यता है कि राजिम की मिट्टी में आज भी तप और त्याग की शक्ति समाहित है, जो साधकों और श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।

लोककथाएँ और जनविश्वास
राजिम से जुड़ी कई लोककथाएँ आज भी ग्रामीण अंचलों में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि त्रिवेणी संगम पर रात के समय दिव्य प्रकाश दिखाई देता है और साधकों को अलौकिक अनुभूति होती है। कुछ कथाओं में इसे देवताओं के विचरण का स्थल बताया गया है। ये लोकविश्वास राजिम को रहस्य और श्रद्धा का केंद्र बनाते हैं।

इतिहास और संस्कृति का संगम
इतिहासकारों के अनुसार, राजिम कलचुरी काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ प्राप्त शिलालेख और प्राचीन अवशेष बताते हैं कि यह नगर व्यापार, धर्म और कला का संगम रहा है। राजिम की कहानियाँ केवल आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का भी आधार हैं।