राजिम कुम्भ कल्प हमारी समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर का प्रतीकः राज्यपाल श्री रमेन डेका

त्रिवेणी संगम राजिम के पावन तट स्थित नवीन मेला मैदान में आयोजित राजिम कुम्भ कल्प मेला 2026 के भव्य शुभारंभ अवसर पर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल महामहिम श्री रमेन डेका मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर राज्यपाल श्री डेका, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल, अन्य अतिथियों एवं संत-महात्माओं ने भगवान श्री राजीवलोचन की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर विधिवत पूजा-अर्चना की तथा प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति एवं खुशहाली की कामना की।

शुभारंभ अवसर पर अपने उद्बोधन में राज्यपाल श्री रमेन डेका ने कहा कि महानदी, पैरी एवं सोंढूर नदियों के पवित्र संगम पर स्थित राजिम की भूमि अत्यंत पुण्य, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व रखती है। उन्होंने कहा कि इस पावन स्थल पर आयोजित राजिम कुम्भ कल्प मेला, जिसे श्रद्धालु ‘कल्प कुम्भ’ के नाम से जानते हैं, हमारी समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है।

राज्यपाल श्री डेका ने कहा कि राजिम कुम्भ कल्प के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता एवं गौरव का अनुभव हो रहा है। छत्तीसगढ़ की पवित्र नगरी राजिम में कुम्भ मेला स्थल पर आकर उन्हें विशेष शांति की अनुभूति होती है। उन्होंने देश के विभिन्न प्रांतों से पधारे साधु-संतों, विद्वानों एवं श्रद्धालुजनों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए कुलेश्वर महादेव, भगवान श्री राजीवलोचन एवं राजिम भक्ति माता से देश-प्रदेश की सुख-शांति एवं समृद्धि के लिए प्रार्थना की।

राजिम छत्तीसगढ़ की आस्था का प्रतीक

राज्यपाल ने कहा कि राजिम माघी पुन्नी मेला छत्तीसगढ़ की आस्था का प्रतीक है। यह पावन आयोजन न केवल प्रदेश बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। राजिम प्राचीन काल से ही शैव एवं वैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां स्थित राजीवलोचन मंदिर में भगवान विष्णु चतुर्भुज स्वरूप में विराजमान हैं तथा कुलेश्वर महादेव के रूप में भगवान शिव की विशेष आराधना की जाती है।

पंचकोशी यात्रा विश्वविख्यात


राज्यपाल श्री डेका ने कहा कि कुलेश्वरनाथ महादेव, पटेश्वर नाथ महादेव, चंपेश्वर नाथ महादेव, ब्रह्मकेश्वर नाथ, फनीकेश्वर नाथ एवं करपूरेश्वर नाथ महादेव की पंचकोशी यात्रा विश्वविख्यात है। राजिम क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों की बहुलता इसे पुरातात्विक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशिष्ट स्थान प्रदान करती है, जहां मूर्तिकला के गौरवशाली इतिहास के दर्शन होते हैं।

उन्होंने कहा कि शास्त्रों में माघ मास को पुण्य मास माना गया है। इस पावन अवधि में पवित्र नदियों एवं त्रिवेणी संगमों में पुण्य स्नान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। माघ माह में आयोजित होने वाले मेलों का विशेष सामाजिक एवं सामुदायिक महत्व है, जहां विभिन्न संस्कृतियों का संगम होता है तथा नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलता है।

राज्यपाल श्री डेका ने राजिम कुम्भ में पधारे समस्त साधु-संतों, विद्वानों एवं धर्मगुरुओं को नमन करते हुए कहा कि भारत साधु-संतों की भूमि रही है। संतों के सान्निध्य से समाज में सकारात्मक ऊर्जा, ज्ञान एवं नैतिक मूल्यों का संचार होता है। जहां संतों का सम्मान होता है, वहां शांति, समृद्धि और खुशहाली स्वतः स्थापित होती है।

उन्होंने कहा कि राजिम कुम्भ कल्प जैसे भव्य आयोजनों से पर्यटन को भी विशेष प्रोत्साहन मिलता है। श्रद्धालुओं की आस्था, संतों का आशीर्वाद एवं कलाकारों की प्रस्तुतियों ने राजिम कुम्भ को राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। आधुनिक युग में कला, साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है, जिससे छत्तीसगढ़ पर्यटन मानचित्र पर और अधिक सशक्त रूप से उभर सके।

राज्यपाल ने कहा कि यह देखकर विशेष प्रसन्नता हो रही है कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा राजिम कुम्भ कल्प का आयोजन स्वच्छता, सुरक्षा एवं आधुनिक सुविधाओं के साथ किया जा रहा है। यह आयोजन आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ पर्यटन, लोक संस्कृति एवं सामाजिक समरसता को भी नई दिशा देगा।

उन्होंने अपने उद्बोधन में पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने नदियों, सरोवरों एवं वृक्षों के संरक्षण को विशेष महत्व दिया है। आज आवश्यकता है कि हम स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण एवं माइक्रो प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करें।

अंत में राज्यपाल श्री रमेन डेका ने सभी साधु-संतों, धार्मिक गुरुओं एवं श्रद्धालुओं का पुनः स्वागत करते हुए कामना की कि राजिम कुम्भ कल्प 2026 छत्तीसगढ़ को आध्यात्मिक मानचित्र पर और अधिक सशक्त रूप से स्थापित करेगा।

राजिम कुम्भ ने बनाई विश्वस्तरीय पहचान

इस अवसर पर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने भगवान श्री राजीवलोचन एवं कुलेश्वर महादेव को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए कहा कि राजिम कुम्भ कल्प हमारी सांस्कृतिक उत्सव परंपरा एवं लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव है, जो सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं परंपराएं आज विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं और स्थानीय परंपराओं का सम्मान अत्यंत आवश्यक है।

आयुक्त श्री महादेव कावरे ने स्वागत भाषण में कहा कि त्रिवेणी संगम केवल नदियों का संगम नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास एवं सनातन संस्कृति का प्रतीक है। राजिम कुम्भ कल्प मेला सामाजिक समरसता एवं एकता का संदेश देता है।


संत श्री राजीव लोचन महाराज ने कहा कि वर्ष 2006 से ‘छत्तीसगढ़ के प्रयाग’ के रूप में पहचान बना चुका राजिम कुम्भ कल्प, वर्ष 2026 में अपनी पावन परंपरा की निरंतरता को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन देशभर को जोड़ने का कार्य कर रहा है।

पं. युवराज पांडेय ने कहा कि नासिक, हरिद्वार, प्रयागराज एवं उज्जैन की भांति राजिम कुम्भ कल्प ने भी सम्पूर्ण भारत में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली है और यह मेला छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

इस अवसर पर राज्य गृह भंडार निगम के अध्यक्ष श्री चंदूलाल साहू, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री गौरीशंकर कश्यप, नगर पालिका राजिम अध्यक्ष श्री महेश यादव, नगर पालिका गोबरा नवापारा अध्यक्ष श्रीमती ओमकुमारी साहू, गरियाबंद कलेक्टर श्री भगवान सिंह उईके, जिला पंचायत सीईओ श्री प्रखर चंद्राकर सहित जनप्रतिनिधिगण, साधु-संत एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।