राजिम कुम्भ में राज्य के कलाकारों को मिलता है सशक्त मंच

राजिम कुम्भ कल्प 2026 छत्तीसगढ़ की धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। पवित्र त्रिवेणी संगम की भूमि पर आयोजित यह महापर्व केवल संत-समागम और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यहां लोकसंस्कृति, लोककला और आंचलिक प्रतिभाओं को भी विशेष सम्मान और अवसर प्रदान किया जाता है। राजिम कुम्भ में आंचलिक कलाकारों को मिलने वाला मंच छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम बन चुका है। राजिम कुम्भ के आयोजन में प्रतिवर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेष श्रृंखला आयोजित की जाती है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों और अंचलों से आए लोक कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। इन प्रस्तुतियों में पंथी नृत्य, राउत नाचा, सुआ नृत्य, करमा, जसगीत, भजन, लोकगाथाएं तथा पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियां शामिल रहती हैं। यह मंच कलाकारों को अपनी पारंपरिक कला को व्यापक दर्शक वर्ग के सामने प्रस्तुत करने का अवसर देता है। आंचलिक कलाकारों के लिए राजिम कुम्भ का मंच केवल प्रस्तुति का स्थान नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान का माध्यम भी है। यहां कलाकारों की कला को श्रद्धालुओं, पर्यटकों और विभिन्न राज्यों से आए अतिथियों द्वारा देखा और सराहा जाता है। इससे कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें भविष्य में अन्य मंचों पर अवसर प्राप्त करने की संभावनाएं भी मजबूत होती हैं। राजिम कुम्भ में आयोजित सांस्कृतिक संध्याएं श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं। दिनभर धार्मिक अनुष्ठानों और दर्शन के पश्चात संध्या काल में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम वातावरण को आनंद, भक्ति और उल्लास से भर देते हैं। आंचलिक कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से लोकजीवन, परंपरा और सामाजिक मूल्यों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं। आयोजन समिति और जिला प्रशासन द्वारा आंचलिक कलाकारों के चयन, मंच व्यवस्था और समय निर्धारण को लेकर विशेष ध्यान दिया जाता है। कलाकारों को सुव्यवस्थित मंच, निर्धारित समय और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे वे गरिमापूर्ण वातावरण में अपनी प्रस्तुति दे सकें। यह व्यवस्था स्थानीय प्रतिभाओं के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता को दर्शाती है। राजिम कुम्भ का यह सांस्कृतिक मंच लोककला के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिकता के दौर में जब कई पारंपरिक कलाएं लुप्त होने की कगार पर हैं, ऐसे आयोजनों के माध्यम से उन्हें नया जीवन और नई पहचान मिलती है। युवा पीढ़ी भी इन प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ती है। इसके साथ ही, राजिम कुम्भ में आंचलिक कलाकारों को मंच मिलने से स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता है। गांव-कस्बों से जुड़े कलाकार अपनी कला को लेकर अधिक सक्रिय होते हैं और नई पीढ़ी को भी लोककला सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। यह सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है। राजिम कुम्भ कल्प 2026 में आंचलिक कलाकारों को मिलने वाला मंच आस्था, संस्कृति और परंपरा का सशक्त संगम है। यह मंच छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने, स्थानीय प्रतिभाओं को सम्मान देने और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। राजिम कुम्भ न केवल धार्मिक महापर्व है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत उत्सव भी है।

राजिम कुंभ कल्प में दिखती है ‘अखाड़ा संस्कृति’ की जीवंत झलक

छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र राजिम कुंभ कल्प केवल एक तीर्थ आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परंपरा की जीवंत प्रयोगशाला है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम पर आयोजित यह कुंभ कल्प हर वर्ष साधु-संतों, श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस आयोजन की सबसे विशिष्ट और आकर्षक विशेषता है- अखाड़ा संस्कृति, जो भारतीय सन्यास परंपरा की रीढ़ मानी जाती है। अखाड़ा क्या है? अखाड़ा मूलतः साधु-संतों का वह संगठित समुदाय है, जहाँ सन्यासी साधना, शास्त्र अध्ययन, योग, ध्यान और आत्मअनुशासन के मार्ग पर चलते हैं। अखाड़े केवल धार्मिक संस्थान नहीं, बल्कि सामाजिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत में प्राचीन काल से अखाड़े धर्म की रक्षा, समाज को दिशा देने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत रखने का कार्य करते आए हैं। राजिम कुंभ कल्प और अखाड़ा राजिम कुंभ कल्प के दौरान विभिन्न प्रमुख अखाड़ों की उपस्थिति इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है। जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा जैसे प्रतिष्ठित अखाड़ों के साधु यहाँ अपने-अपने शिविर स्थापित करते हैं। इन शिविरों में साधुओं का जीवन, उनकी दिनचर्या और उनकी साधना प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है, जो आम श्रद्धालुओं के लिए एक दुर्लभ अनुभव होता है। नागा साधु: आकर्षण का केंद्र राजिम कुंभ कल्प में नागा साधु विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं। भस्म से लिप्त शरीर, जटाओं का जाल, अल्प वस्त्र या निर्वस्त्र जीवन और कठोर तपस्या—नागा साधु वैराग्य की चरम अवस्था का प्रतीक माने जाते हैं। उनकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि भौतिक सुखों से परे भी एक गहन आध्यात्मिक संसार है। अखाड़ा परंपरा और शाही स्नान कुंभ कल्प के दौरान होने वाला शाही स्नान अखाड़ा संस्कृति का सबसे भव्य और अनुशासित स्वरूप प्रस्तुत करता है। अखाड़ों की पेशवाई, ध्वज, ढोल-नगाड़े, हाथी-घोड़े और साधुओं की अनुशासित टोलियाँ—यह सब मिलकर एक अलौकिक दृश्य रचते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि अखाड़ों के आपसी अनुशासन और वरिष्ठता को भी दर्शाती है। आध्यात्मिक संवाद और ज्ञान परंपरा राजिम कुंभ कल्प में अखाड़ों के माध्यम से शास्त्रार्थ, प्रवचन, योग शिविर और धार्मिक चर्चाएँ आयोजित की जाती हैं। ये आयोजन जनसामान्य को भारतीय दर्शन, वेदांत, भक्ति और योग की गूढ़ परंपराओं से परिचित कराते हैं। साधु-संतों के प्रवचन जीवन के उद्देश्य, नैतिकता और आत्मिक शांति की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। आधुनिक समय में अखाड़ा संस्कृति का महत्व आज के भौतिकवादी युग में अखाड़ा संस्कृति हमें संयम, अनुशासन और आत्मचिंतन का संदेश देती है। राजिम कुंभ कल्प जैसे आयोजन यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन परंपराएँ आज भी प्रासंगिक हैं और समाज को संतुलन प्रदान कर सकती हैं। अखाड़े न केवल धर्म की रक्षा करते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के संवाहक भी हैं।

त्रेतायुग से जुड़ी है आस्था की नगरी राजिम की मान्यता

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित राजिम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि समय की परतों में छिपा एक रहस्य है। मान्यताओं के अनुसार, इस ऐतिहासिक नगरी के तार त्रेतायुग से जुड़े हुए हैं। तीन जीवनदायिनी महानदी, पैरी और सोंढुर नदी के पावन संगम पर बसा राजिम छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहलाता है, जहां आस्था और इतिहास एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यहां प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा पर लगने वाला मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत प्रमाण है। देशभर से आने वाले श्रद्धालु इसे चौथे कुंभ के रूप में स्वीकार करते हैं। संगम तट पर फैली यह नगरी धीरे-धीरे एक ऐसे आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित हुई है, जहां दृश्य से अधिक अदृश्य अनुभूतियां बोलती हैं। राजिम की भूमि पर खड़े मंदिर केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति और शिल्पकला के मौन साक्ष्य हैं। इन्हीं में से एक है राजीवलोचन मंदिर, जिसका निर्माण आठवीं-नौवीं शताब्दी का माना जाता है। बारह स्तंभों पर टिका यह मंदिर अपने भीतर अनेक रहस्य समेटे हुए है। स्तंभों पर अंकित अष्टभुजा दुर्गा, गंगा-यमुना और भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार मानो काल से संवाद करते प्रतीत होते हैं। अभिलेखों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण राजा जगतपाल द्वारा कराया गया था, जबकि अन्य शिलालेख वसंतराज और मगध नरेश सूर्यवर्मा की पुत्री वासटा से जुड़े संकेत देते हैं। मंदिर परिसर में तपस्या में लीन बुद्ध की प्रतिमा और गर्भगृह में सिंहासन पर विराजमान काले पत्थर की विष्णु प्रतिमा, राजिम की बहुस्तरीय धार्मिक चेतना को दर्शाती है। शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए भगवान राजीवलोचन की यह चतुर्भुजी मूर्ति श्रद्धालुओं को मौन भाव से अपनी ओर आकर्षित करती है। महामंडप में गरुड़ की विनम्र मुद्रा और गर्भगृह द्वार पर उकेरी गई सर्पाकार मानव आकृतियां मंदिर की रहस्यमयी आभा को और गहरा करती हैं। मंदिरों से आगे बढ़ते ही पश्चिम दिशा का प्राचीन द्वार दिखाई देता है, जिस पर राजिम का पुरातन नाम ‘कमलक्षेत्र पद्मावतीपुरी’ अंकित है। यहीं से नदियों की ओर जाने वाला मार्ग खुलता है, जहां भूतेश्वर, पंचेश्वर नाथ और त्रिवेणी के मध्य स्थित कुलेश्वर नाथ महादेव का शिवलिंग आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक बनकर स्थापित है। राजीवलोचन की विग्रह मूर्ति के एक कोने में अंकित गजराज और कमल की कथा इस क्षेत्र की सबसे रहस्यमयी कथाओं में से एक मानी जाती है। मान्यता है कि ग्राह से पीड़ित गजराज ने अपनी पीड़ा कमल के माध्यम से भगवान विष्णु तक पहुंचाई थी। उस पुकार को सुनकर भगवान विष्णु महालक्ष्मी के साथ विश्राम छोड़ नंगे पांव राजीव क्षेत्र पहुंचे और गजराज की रक्षा की। यह कथा आज भी संगम तट की हवा में अनकही तरह से गूंजती प्रतीत होती है। कुलेश्वर से दक्षिण दिशा में स्थित लोमश ऋषि का आश्रम, जिसे बेलहारी कहा जाता है, हरिहर उपासना का दुर्लभ केंद्र है। यहीं महर्षि लोमश ने शिव और विष्णु की एकरूपता का महामंत्र दिया था। आज भी कुलेश्वर महादेव की अर्चना उसी परंपरा के अनुसार की जाती है, मानो समय यहां ठहर गया हो।

राजिम कुम्भ (कल्प) : आस्था, इतिहास और कथाओं का संगम

छत्तीसगढ़ के हृदय में स्थित राजिम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही विशेष कहानियों, लोकविश्वासों और ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत साक्ष्य है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा यह पावन नगर छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहलाता है। राजिम से जुड़ी कथाएँ इसे साधारण तीर्थ से कहीं अधिक अलौकिक बनाती हैं। भगवान राजीव लोचन की कथा राजिम की सबसे प्रसिद्ध कहानी भगवान राजीव लोचन से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु यहाँ कमलनयन स्वरूप में विराजमान हुए। कहा जाता है कि एक निषादराज ने अपनी गहरी श्रद्धा से भगवान को प्रसन्न किया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने इस पवित्र भूमि पर प्रकट होकर भक्त को दर्शन दिए। तभी से यह क्षेत्र राजीव लोचन धाम के नाम से जाना गया। मंदिर की स्थापत्य कला भी इस कथा की भव्यता को दर्शाती है, जहाँ पत्थरों पर उकेरी गई प्राचीन मूर्तियाँ आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। कुलेश्वर महादेव और त्रिवेणी संगम राजिम की दूसरी विशेष कहानी कुलेश्वर महादेव से जुड़ी है। यह मंदिर महानदी के बीच एक छोटे से द्वीप पर स्थित है। लोककथाओं के अनुसार, भगवान शिव स्वयं यहाँ प्रकट हुए थे और त्रिवेणी संगम की रक्षा का दायित्व संभाला। मान्यता है कि कुलेश्वर महादेव के दर्शन किए बिना राजिम यात्रा अधूरी मानी जाती है। महाशिवरात्रि और कुंभ कल्प के दौरान यहाँ विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है। राजिम कुंभ कल्प की परंपरा राजिम से जुड़ी एक महत्वपूर्ण आधुनिक परंपरा है राजिम कुंभ कल्प। वर्ष 2005 से प्रारंभ हुआ यह आयोजन आज देशभर के संतों, नागा साधुओं और श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र बन चुका है। मान्यता है कि संगम में स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। संतों के प्रवचन, शाही स्नान और अखाड़ों की परंपरा ने राजिम को राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। लोमश ऋषि की तपोभूमि पुराणों के अनुसार, राजिम क्षेत्र लोमश ऋषि की तपोभूमि रहा है। कहा जाता है कि ऋषि लोमश ने यहाँ वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे यह भूमि सिद्ध क्षेत्र बन गई। स्थानीय जनमान्यता है कि राजिम की मिट्टी में आज भी तप और त्याग की शक्ति समाहित है, जो साधकों और श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है। लोककथाएँ और जनविश्वास राजिम से जुड़ी कई लोककथाएँ आज भी ग्रामीण अंचलों में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि त्रिवेणी संगम पर रात के समय दिव्य प्रकाश दिखाई देता है और साधकों को अलौकिक अनुभूति होती है। कुछ कथाओं में इसे देवताओं के विचरण का स्थल बताया गया है। ये लोकविश्वास राजिम को रहस्य और श्रद्धा का केंद्र बनाते हैं। इतिहास और संस्कृति का संगम इतिहासकारों के अनुसार, राजिम कलचुरी काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ प्राप्त शिलालेख और प्राचीन अवशेष बताते हैं कि यह नगर व्यापार, धर्म और कला का संगम रहा है। राजिम की कहानियाँ केवल आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का भी आधार हैं।

कृषि और उर्वरता का प्रतीक है राजीव लोचन मंदिर की गजलक्ष्मी प्रतिमा: 8वीं–9वीं शताब्दी की अद्वितीय धरोहर

छत्तीसगढ़ के प्राचीन वैष्णव तीर्थ राजिम स्थित राजीव लोचन मंदिर में 8वीं–9वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी प्रतिमा आज भी श्रद्धा, कला और सांस्कृतिक समृद्धि का सजीव प्रमाण है। कृषि, उर्वरता और ऐश्वर्य की प्रतीक मानी जाने वाली यह प्रतिमा मंदिर की शिल्प परंपरा को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।   नगर के प्रमुख भगवान विष्णु के स्वरूप राजीव लोचन मंदिर के चारों कोणों पर चार धाम के रूप में नरसिंह अवतार, वराह अवतार, वामन अवतार एवं बद्री नारायण भगवान के मंदिर स्थापित हैं। पश्चिमाभिमुख बद्री नारायण मंदिर की पीछे की भित्ति पर देवी-देवताओं की उत्कृष्ट उत्कीर्ण प्रतिमाएं हैं, जिनमें उत्तराभिमुख गजलक्ष्मी की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्हें कृषि और उर्वरता की देवी के साथ-साथ राज को समृद्धि प्रदान करने वाली ‘राजलक्ष्मी’ भी कहा गया है। शास्त्रों में लक्ष्मी के आठ स्वरूप—आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयालक्ष्मी एवं विद्यालक्ष्मी—वर्णित हैं। दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि प्रत्येक गृह, प्रतिष्ठान एवं कार्यस्थल पर लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी की पूजा श्रेष्ठ मानी गई है। राजिम में भगवान राजीव लोचन के साथ लक्ष्मी माता, लक्ष्मी नारायण मंदिर, राम मंदिर सहित अनेक मंदिरों की उपस्थिति वैष्णव परंपरा को सुदृढ़ करती है। साथ ही कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर और मां महामाया के शक्तिपीठ से शैव, शाक्त एवं वैष्णव परंपराओं का समन्वय इस नगरी की विशिष्ट पहचान है। राजीव लोचन मंदिर में स्थित गजलक्ष्मी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। देवी लक्ष्मी अपने चार हाथों के साथ सुशोभित हैं, जिनमें प्रकृति, दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति के प्रतीक भाव निहित हैं। लगभग डेढ़ फीट ऊंची यह मनोहारी प्रतिमा भूरे पत्थर पर उत्कीर्ण है, जिसमें मूर्तिकार की छेनी-हथौड़ी की अद्भुत दक्षता परिलक्षित होती है। इसका निर्माण मंदिर के समकालीन 8वीं–9वीं शताब्दी का माना जाता है।   पुराणों में हाथी को राजसी पशु माना गया है। गजलक्ष्मी का वाहन श्वेत हाथी है, जिसे उत्कीर्ण चित्रों में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। मान्यता है कि गजलक्ष्मी ने भगवान इंद्र को समुद्र की गहराई से खोए हुए धन को प्राप्त कराने में सहायता की थी।   शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार लक्ष्मी का एक नाम कमला है और वे दसमहाविद्याओं में भी स्थान रखती हैं। स्कंद पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में लक्ष्मीजी भी थीं, जिन्हें भगवान विष्णु ने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पुराणों में लक्ष्मी के विभिन्न निवास—बैकुंठ, स्वर्ग, गृह, यज्ञ, गोलोक, पाताल और भूलोक—का उल्लेख मिलता है, जिनमें राजलक्ष्मी का पाताल और भूलोक में निवास बताया गया है। इस प्रकार राजीव लोचन मंदिर की गजलक्ष्मी प्रतिमा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय शिल्पकला, वैष्णव परंपरा और सांस्कृतिक समृद्धि की अमूल्य विरासत के रूप में आज भी श्रद्धालुओं और इतिहासप्रेमियों को आकर्षित करती है।  

राजिम का त्रिवेणी संगमः छत्तीसगढ़ का प्रयाग, जहां पितरों के नाम होता है श्राद्ध-तर्पण

    छत्तीसगढ़ का प्राचीन और पावन तीर्थ राजिम, महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित है। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पितृ तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। इसी वजह से राजिम को “छत्तीसगढ़ का प्रयाग” कहा जाता है। यहां हर वर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर माघी पुन्नी मेला और कुंभ का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं।     आमतौर पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की बात आते ही बिहार के गयाजी तीर्थ का स्मरण होता है, जिसकी मान्यता पुराणों में वर्णित है। लेकिन देश में कुछ अन्य तीर्थ भी हैं, जहां ये पितृ कर्म संपन्न किए जाते हैं। इन्हीं में छत्तीसगढ़ का राजिम तीर्थ भी प्रमुख है। तीन नदियों के संगम के कारण इस स्थल को प्रयाग जैसी पवित्रता प्राप्त है। माघ मास में यहां विशाल मेला लगता है और श्राद्ध पक्ष में बड़ी संख्या में लोग अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं।     राजिम में भी लगता है कुंभ हरिद्वार और प्रयाग की तरह राजिम में भी कुंभ का आयोजन किया जाता है। यहां मृतकों की अस्थियों का विसर्जन भी किया जाता है। इस तीर्थ की धार्मिक महत्ता का बड़ा कारण यहां स्थित राजीव लोचन मंदिर है, जो भगवान श्रीराम को समर्पित है। इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी का मानते हैं। कहा जाता है कि माता कौशल्या श्रीराम को ‘राजीव नयन’ कहा करती थीं, क्योंकि उनके नेत्र कमल के समान थे।   दंडकारण्य से जुड़ी है राजिम की कथा रामायण काल में राजिम क्षेत्र दंडकारण्य का हिस्सा था। लोककथाओं के अनुसार, इस क्षेत्र को पहले पद्मावती या पद्मपुर कहा जाता था। उस समय यहां राक्षसों का उत्पात था, जिससे क्षेत्र के राजा रत्नाकर यज्ञ और तपस्या के माध्यम से रक्षा करते थे। एक बार राक्षसों द्वारा यज्ञ भंग किए जाने से दुखी होकर राजा ने कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और यहां अवतार लेकर निवास करने का वरदान दिया। मान्यता है कि तभी भगवान विष्णु मूर्ति रूप में यहां स्थापित हुए और उनकी प्रतिमा पर बड़ी-बड़ी आंखें उभर आईं, जिससे वे राजीव लोचन कहलाए।     राजिम माई से जुड़ा नामकरण राजिम तीर्थ का नाम एक भक्त महिला राजिम माई से जुड़ा है, जो जाति से तेलिन थीं और श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। लोककथा के अनुसार, उन्हें महानदी में बहती हुई श्रीराम शिला मिली, जिसे वे अपने घर ले आईं। इसके बाद उनके घर में सुख-समृद्धि आई। बाद में राजा को स्वप्न में भगवान विष्णु का आदेश हुआ और उन्होंने राजिम माई से वह शिला प्राप्त कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाई। उसी के बाद इस क्षेत्र को राजिम तीर्थ के नाम से जाना गया।   जगन्नाथ महाप्रभु से भी है गहरा संबंध आज भी राजीव लोचन मंदिर परिसर में राजिम माई का मंदिर विराजमान है। इस लोककथा का उल्लेख लेखक धनंजय चोपड़ा ने अपनी पुस्तक भारत में कुंभ में भी किया है। मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक श्रद्धालु राजिम के दर्शन न कर लें। कहा जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान जगन्नाथ यहां पधारते हैं। इस दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पट बंद रहते हैं और श्रद्धालुओं को राजीव लोचन मंदिर में ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन होते हैं।     भगवान श्रीराम की उपस्थिति, जगन्नाथ महाप्रभु से जुड़ा विश्वास और त्रिवेणी संगम का पौराणिक महत्वकृइन सभी कारणों से राजिम तीर्थ श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। यही वजह है कि जैसे लोग गयाजी जाकर पितृ कर्म करते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ में राजिम को भी श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के प्रमुख तीर्थ के रूप में माना जाता है।  

राजिम कुम्भ कल्प में संतों के समागम से होता है अद्भुत ऊर्जा का प्रवाह

छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर स्थित राजिम कुम्भ कल्प केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर आयोजित यह कुम्भ कल्प हर वर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक श्रद्धा, साधना और संत-संवाद का विराट मंच बनता है। विशेष रूप से संतों और महात्माओं के समागम से यहां ऐसी अद्भुत ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिसे अनुभूति के स्तर पर ही समझा जा सकता है। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। जिस प्रकार प्रयागराज में संगम स्नान से आत्मिक शुद्धि की परंपरा है, उसी तरह राजिम कुम्भ कल्प में आस्था की डुबकी श्रद्धालुओं के मन-मस्तिष्क को नई दिशा देती है। लेकिन इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता है-देश के विभिन्न कोनों से आए संत, नागा साधु, महात्मा और धर्माचार्य। जब विविध पंथों, संप्रदायों और विचारधाराओं के संत एक मंच पर एकत्र होते हैं, तब विचारों का संगम होता है और वहीं से ऊर्जा का वह अदृश्य प्रवाह जन्म लेता है, जो समाज को सकारात्मकता से भर देता है। संतों के प्रवचन, शास्त्रार्थ और सत्संग केवल धार्मिक उपदेश नहीं होते, बल्कि जीवन को संतुलित, संयमित और सार्थक बनाने की प्रेरणा देते हैं। राजिम कुम्भ कल्प में जब संत मानवता, करुणा, अहिंसा और सेवा जैसे मूल्यों पर बात करते हैं, तो श्रोता स्वयं को भीतर से परिवर्तित होता हुआ महसूस करता है। यही वह आध्यात्मिक ऊर्जा है, जो व्यक्ति को नकारात्मकता से मुक्त कर आत्मिक शांति की ओर ले जाती है। कुम्भ कल्प के दौरान अखाड़ों की परंपरा, संतों की शोभायात्रा और वैदिक अनुष्ठान वातावरण को विशेष रूप से ऊर्जावान बना देते हैं। मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और दीप-धूप की सुगंध से पूरा क्षेत्र एक आध्यात्मिक क्षेत्र (स्पिरिचुअल ज़ोन) में परिवर्तित हो जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शक नहीं रहते, बल्कि इस ऊर्जा के सहभागी बन जाते हैं। कई लोग मानते हैं कि राजिम कुम्भ कल्प से लौटने के बाद उनके जीवन में मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास होता है। संतों का यह समागम सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां धर्म, जाति और वर्ग की सीमाएं स्वतः ही गौण हो जाती हैं। एक ही घाट पर संत, गृहस्थ, युवा, बुजुर्ग और बच्चे समान भाव से स्नान करते हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की उस मूल भावना को साकार करता है, जहां “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल कथन नहीं, बल्कि व्यवहार बन जाता है। आज के तनावपूर्ण और भौतिकतावादी जीवन में राजिम कुम्भ कल्प जैसे आयोजन मानव को अपने भीतर झांकने का अवसर देते हैं। संतों के सान्निध्य में प्राप्त होने वाली ऊर्जा केवल कुछ दिनों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लंबे समय तक जीवन को दिशा देती है। यही कारण है कि हर वर्ष राजिम कुम्भ कल्प में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। यह आयोजन छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है और यह संदेश देता है कि संतों का सान्निध्य आज भी मानव जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था।

राजिम कॉरिडोर

राजिम कॉरिडोर छत्तीसगढ़ की एक महत्वाकांक्षी धार्मिक और पर्यटन परियोजना है, जिसका उद्देश्य राजिम शहर को उज्जैन के महाकाल लोक और वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर एक विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल के रूप में पुनर्जीवित करना है। राजिम, जिसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। यह महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर स्थित है।      कॉरिडोर परियोजना की मुख्य विशेषताएं राजिम कॉरिडोर के विकास के लिए सरकार ने व्यापक योजना तैयार की है, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख बिंदु शामिल हैंः    भव्य मंदिर परिसरः राजिम के ऐतिहासिक राजीव लोचन मंदिर और संगम के बीच स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर को कॉरिडोर के माध्यम से जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं को एक निर्बाध और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करना है।   घाटों का सौंदर्यीकरणः त्रिवेणी संगम के तटों को आधुनिक घाटों के साथ विकसित किया जा रहा है। यहां आरती के लिए विशेष स्थान और श्रद्धालुओं के स्नान के लिए सुरक्षित व्यवस्था की जाएगी।   पर्यटन सुविधाएंः कॉरिडोर में भक्तों के लिए विश्राम गृह (भक्त निवास), विशाल पार्किंग क्षेत्र, संग्रहालय, और छत्तीसगढ़ की संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले शिल्प ग्राम विकसित किए जाने की योजना है।   कनेक्टिविटी में सुधारः जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने राजिम-फिंगेश्वर-महासमुंद मार्ग के सुदृढ़ीकरण और उन्नयन के लिए 146.86 करोड़ रूपए स्वीकृत किए हैं, जो इस क्षेत्र में पहुंच को और आसान बनाएगा।      राजिम कुम्भ कल्प मेला 2026 कॉरिडोर के विकास के साथ-साथ, यहां आयोजित होने वाला वार्षिक मेले को अब राजिम कुम्भ कल्प के रूप में जाना जाता है। इस वर्ष यह भव्य कुम्भ कल्प 1 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।   थीमः 2026 के कुम्भ की विशेष थीम बारह ज्योतिर्लिंग रखी गई है, जिसके तहत संगम स्थल पर भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृतियां और आध्यात्मिक प्रदर्शनी लगाई जा रही है।   धार्मिक गतिविधियांः मेले के दौरान शाही स्नान, संत समागम, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित की जाती है। इस वर्ष मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह के तहत 200 जोड़ों का विवाह भी प्रस्तावित है।    सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व राजिम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। यहां का राजीव लोचन मंदिर (8वीं शताब्दी) अपनी द्रविड़ और नागर शैली के मिश्रण के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि जगन्नाथ पुरी की यात्रा तब तक अधूरी रहती है जब तक भक्त राजिम में भगवान राजीव लोचन के दर्शन नहीं कर लेते।    विकास का प्रभाव इस कॉरिडोर के निर्माण से न केवल छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान वैश्विक स्तर पर मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। सरकार का लक्ष्य इसे एक ऐसा केंद्र बनाना है जहाँ आधुनिक बुनियादी ढांचे और प्राचीन विरासत का अद्भुत संगम हो। वर्तमान में, राज्य सरकार केंद्र के सहयोग से इस परियोजना को तेजी से पूरा करने की दिशा में कार्य कर रही है।

छत्तीसगढ़ का महाकुंभ…संगम से 750 मीटर दूर भरेगा राजिम कुंभ कल्प मेला

Rajim Kumbh Mela Festival 2025 : छत्तीसगढ़ में होने वाले राजिम कुंभ महोत्सव मेले का स्थान बदलने जा रहा है। ऐसा करीब 20 साल बाद होगा। राजिम कुंभ कल्प का आयोजन 12 फरवरी से 26 फरवरी तक होगा। जिला प्रशासन की ओर से मिली अनाधिकारिक जानकारी के अनुसार मेला इस बार संगम स्थल नहीं, बल्कि वहां से 750 मीटर दूर लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच लगाया जाएगा। लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच अस्थाई रोड बनेगी लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच अस्थाई सड़क (रेत–मुरूम) जिला प्रशासन बनाएगा। इसके अलावा यात्रियों के लिए गाड़ियों की पार्किंग की व्यवस्था भी की जाएगी। गरियाबंद जिला प्रशासन और छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अधिकारियों ने तैयारियां शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार राजिम कुंभ की तैयारियों को लेकर पिछले दिनों सीएम विष्णुदेव साय ने बैठक ली थी। इस दौरान नए स्थल का प्रस्ताव सीएम साय को दिखाया गया। सीएम साय ने भीड़ और व्यवस्थाओं को देखकर नई जगह पर सहमति दी। भूपेश सरकार के दौरान तय हुई थी यह जगह बैठक में सीएम ने श्रद्धालुओं के आने-जाने की व्यवस्था, सुरक्षा संबंधी उपाय और स्वच्छता के लिए विशेष ध्यान देने को कहा। बताया जा रहा है कि लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच मेला लगाने के लिए जगह निर्धारित हुई है। इसकी मार्किंग भूपेश सरकार के कार्यकाल के दौरान 2021 में हुए थी। उसी साल यानी 2021 में यहां पर मेला लगाने का निर्देश भी जारी किया गया था, लेकिन तैयारियां पूरी नहीं हो पाने की वजह से इसको टाल दिया गया था। राजिम कुंभ महोत्सव का स्थान क्यों बदला जा रहा है ? राजिम कुंभ महोत्सव का स्थान 20 साल बाद बदलने का निर्णय लिया गया है। इस बार मेला संगम स्थल पर नहीं, बल्कि संगम से 750 मीटर दूर लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच आयोजित किया जाएगा। यह निर्णय यात्रा की बेहतर व्यवस्था और स्थान की उपयुक्तता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। राजिम कुंभ महोत्सव के नए स्थल में किस तरह की व्यवस्था की जाएगी ? राजिम कुंभ महोत्सव के नए स्थल लक्ष्मण झूला और चौबे बांधा के बीच अस्थाई सड़क बनाई जाएगी। इस सड़क का निर्माण रेत और मुरूम से किया जाएगा। इसके अलावा यात्रियों के लिए गाड़ियों की पार्किंग की व्यवस्था भी की जाएगी। गरियाबंद जिला प्रशासन और छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने इन तैयारियों को शुरू कर दिया है। राजिम कुंभ महोत्सव के नए स्थल को लेकर कब और किसने निर्णय लिया था ? राजिम कुंभ महोत्सव के नए स्थल का निर्धारण भूपेश सरकार के कार्यकाल के दौरान 2021 में किया गया था। उस समय सीएम भूपेश बघेल ने बैठक में इस स्थल की मार्किंग की थी और यहां मेला आयोजित करने का निर्देश भी जारी किया था, हालांकि तैयारियां पूरी नहीं हो पाई थीं और आयोजन को टाल दिया गया था।

Rajim Kumbh Mela: इस बार 52 एकड़ क्षेत्र में होगा भव्य आयोजन

रायपुर: Rajim Kumbh Mela 2025 Date छत्तीसगढ़ के प्रयाग के रूप में प्रसिद्ध राजिम में अगामी माह के 12 से 26 फरवरी तक त्रिवेणी संगम में राजिम कुंभ कल्प का भव्य आयोजन किया जाएगा। राजिम कुंभ के भव्य आयोजन नये मेला स्थल में होगा। इसके लिए जोर-शोर से तैयारियां शुरू कर दी गई है। राजिम कुंभ के आयोजन को लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस संबंध में आज हुई बैठक में राजिम विधायक रोहित साहू, बैठक में पूर्व सांसद चंदूलाल साहू, पूर्व विधायक संतोष उपाध्याय, रायपुर संभाग के आयुक्त महादेव कावरे, गरियाबंद कलेक्टर दीपक अग्रवाल सहित धमतरीं, महासमुंद एवं रायपुर और गरियाबंद जिले के वरिष्ठ अधिकारी, उप संचालक संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग प्रतापचंद पारख सहित वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। Rajim Kumbh Mela 2025 Date बैठक में बताया गया कि आगामी माह में होने वाले कुम्भ कल्प आयोजन लगभग 52 एकड़ क्षेत्र में फैले नया मेला स्थल में होगा। नया मेला स्थल में श्रद्धालुओं के लिए सभी आवश्यक इंतजाम करने के निर्देश दिए गए हैं। राजिम कुंभ आयोजन स्थल में व्यवस्थित रूप से दुकानों और विभागीय स्टॉल के साथ-साथ मीना बाजार भी लगाए जाएंगे। यहां आने वाले लोगों की सुविधा के लिए पार्किंग की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा हेलीपैड भी बनाया जाएगा। मेला स्थल को जोड़ने बनेंगी सड़क – बैठक में संभाग आयुक्त कावरे ने बताया कि राजिम मेला 12 से 26 फरवरी 2025 तक आयोजित की जाएगी। गंगा आरती स्थल से नए मेला स्थल तक नदी किनारे कनेक्टिंग रोड का निर्माण किया जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं के आने-जाने में आसानी होगी। इसके लिए उन्होंने पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों को आवश्यक कार्य करने के निर्देश दिए। साथ ही घाट निर्माण, मरम्मत एवं आसपास साफ सफाई भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। संत समागम एवं गंगा आरती होगा पुराने स्थल में -बैठक में बताया गया कि पुराने स्थल में केवल संत समागम एवं गंगा आरती का आयोजन होगा। इसके अलावा सभी आयोजन एवं गतिविधियां नए मेला स्थल में आयोजित की जाएगी। पुराने स्थल पर कोई भी अस्थाई दुकान लगाने की अनुमति नहीं होगी। सभी अस्थाई दुकान नई जगह पर लगाई जाएगी। संभाग आयुक्त कावरे ने नए स्थल पर लगने वाले मीना बाजार एवं पार्किंग स्थल के लिए टेंडर प्रक्रिया के लिए जरूरी कार्य योजना बनाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि दुकानों का आबंटन एसडीएम की अध्यक्षता में गठित समिति के द्वारा की जाएगी। इसके लिए भी तैयारी शुरू करने के निर्देश दिए। विभागों को सौंप गए दयित्व- राजिम कुंभ कल्प की तैयारी के लिए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को पेयजल आपूर्ति, अस्थाई शौचालय निर्माण, पाइपलाइन एवं पानी टंकी की तैयारी समय में पूर्ण करने के निर्देश दिए गए। साथ ही स्वास्थ्य विभाग को अस्थाई अस्पताल सहित पर्याप्त मात्रा में एंबुलेंस एवं अन्य मेडिकल सुविधा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। इसी प्रकार विद्युत विभाग को लाइटिंग की व्यवस्था, पुलों पर लाइटिंग के साथ सजावट, मेला स्थल में टावर लाइट एवं पार्किंग स्थल में लाइट आदि की व्यवस्था के निर्देश दिए गए। वन विभाग को बांस बल्ली की व्यवस्था, जलाऊ लकड़ी, साधुओं के लिए कुटिया निर्माण के लिए घास की व्यवस्था के निर्देश दिए गए। खाद्य विभाग को नया मेला स्थल में पर्याप्त संख्या में दाल भात केंद्र खोलने खोलने के निर्देश दिए गए। पुलिस विभाग को सुरक्षा के पर्याप्त व्यवस्था, सीसीटीवी, कंट्रोल रूम एवं फायर ब्रिगेड आदि की व्यवस्था के लिए निर्देश दिए गए। नगरीय प्रशासन विभाग को साफ सफाई, कचरा निष्पादन, डस्टबिन की पर्याप्त संख्या सहित मंदिर एवं धार्मिक स्थलों का रंग रोगन एवं साफ सफाई के निर्देश दिए गए।