राजिम कुम्भ कल्प 2026: संत समागम परिसर में सजा पंडोखर सरकार का दिव्य दरबार

  श्रद्धा और आध्यात्म का अद्भुत संगम छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम भूमि पर आयोजित राजिम कुम्भ कल्प 2026 इन दिनों आस्था, आध्यात्म और संस्कृति का विराट उत्सव बनकर उभर रहा है। इसी भव्य आयोजन के अंतर्गत संत समागम परिसर में पंडोखर सरकार के नाम से विख्यात गुरूशरण महाराज का दिव्य दरबार विशेष आकर्षण का केंद्र बना। दूर-दराज के जिलों और विभिन्न प्रदेशों से हजारों श्रद्धालु इस दरबार में शामिल होने पहुंचे, जिससे पूरे परिसर में भक्ति और विश्वास का अद्भुत वातावरण निर्मित हो गया। दरबार का आयोजन विशाल और सुसज्जित पंडाल में किया गया था, जहां प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव हो रहा था। मंच को पारंपरिक सज्जा से अलंकृत किया गया था और वैदिक परंपराओं के अनुरूप कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत पूजा-अर्चना से हुई। भगवान की आरती और गुरू पूजन के साथ दरबार का शुभारंभ हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार की पवित्र ध्वनि और श्रद्धालुओं की सामूहिक उपस्थिति ने वातावरण को और अधिक दिव्य बना दिया। गुरूशरण महाराज के दरबार में पहुंचे श्रद्धालु अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान की अपेक्षा लेकर उपस्थित हुए थे। कई लोग जीवन की जटिलताओं, मानसिक तनाव, पारिवारिक मतभेद या अन्य चिंताओं के साथ मार्गदर्शन की तलाश में आए थे। दरबार के दौरान गुरूशरण महाराज श्रद्धालुओं को संकेत देकर अपने समीप बुलाते और उनकी बातें धैर्यपूर्वक सुनते। इसके पश्चात वे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करते तथा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के उपाय बताते। श्रद्धालुओं के अनुसार, दरबार में मिला परामर्श केवल समस्या का समाधान भर नहीं था, बल्कि आत्मिक संतोष और मानसिक शांति का माध्यम भी बना। कई लोगों ने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें यहां आकर एक नई ऊर्जा और विश्वास प्राप्त हुआ। उनका मानना था कि आध्यात्मिक संवाद के माध्यम से उन्हें अपने जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण मिला। दरबार के दौरान संत समागम परिसर में भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक चर्चाओं का क्रम भी लगातार चलता रहा। मधुर भजनों की ध्वनि, ढोल-मंजीरे की ताल और भक्तों की सामूहिक सहभागिता ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालु भावविभोर होकर भजनों में शामिल होते और आध्यात्मिक अनुभूति का आनंद लेते नजर आए। राजिम कुम्भ कल्प का यह संत समागम केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक जागरण का भी संदेश देता दिखाई दिया। यहां विभिन्न पृष्ठभूमि, आयु और क्षेत्रों से आए लोग एक साथ बैठकर आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे थे। यह दृश्य अपने आप में भारतीय संत परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है, जहां गुरु-शिष्य परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आयोजन के दौरान अनुशासन और व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा गया। स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका से श्रद्धालुओं को सुव्यवस्थित ढंग से दरबार में प्रवेश और दर्शन का अवसर मिला। सुरक्षा और व्यवस्थापन के कारण कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सुचारु रूप से संपन्न हुआ। राजिम कुम्भ कल्प 2026 का यह दिव्य दरबार न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक संतुलन का संदेश भी दे गया। भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत यह आयोजन लंबे समय तक श्रद्धालुओं की स्मृतियों में अंकित रहेगा। संत समागम परिसर में सजा यह दिव्य दरबार राजिम कुम्भ कल्प के आध्यात्मिक वैभव का जीवंत उदाहरण रहा, जहां हजारों लोगों ने एक साथ मिलकर श्रद्धा, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया।

आस्था, संस्कृति और सनातन परंपरा का विराट संगम बना राजिम कुम्भ कल्प 2026

राजिम की पावन धरा एक बार फिर सनातन आस्था, आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक वैभव की साक्षी बनी। छत्तीसगढ़ की धर्मनगरी के रूप में विख्यात यह स्थल हर वर्ष श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, परंतु वर्ष 2026 का राजिम कुम्भ कल्प अपने भव्य स्वरूप, संतों के सानिध्य और श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व सहभागिता के कारण विशेष रूप से ऐतिहासिक बन गया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक मेला नहीं रहा, बल्कि यह सनातन परंपरा की जीवंत अनुभूति और लोकसंस्कृति के संरक्षण का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा। राजिम का त्रिवेणी संगम, जहां महानदी, पैरी नदी और सोंढूर नदी का पवित्र मिलन होता है, इस पूरे आयोजन का केंद्र रहा। मेला अवधि के दौरान प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं ने यहां पहुंचकर पुण्य स्नान किया। मान्यता है कि इस पवित्र संगम में स्नान करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। प्रातः काल से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें संगम तट पर देखी गईं, जहां हर कोई श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन जल में डुबकी लगाकर स्वयं को धन्य महसूस कर रहा था। इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पहलू संत समागम रहा, जिसमें देश के विभिन्न भागों से आए संतों और धर्माचार्यों ने अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज को नैतिक मूल्यों, सेवा, करुणा और सद्भाव का संदेश दिया। यज्ञ, हवन और अखंड भजन कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। इन आध्यात्मिक गतिविधियों ने श्रद्धालुओं के मन में भक्ति और आस्था की भावना को और अधिक सशक्त किया। राजिम स्थित प्राचीन राजीव लोचन मंदिर और कुलेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने रहे। इन मंदिरों की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के कारण दूरदराज से आए श्रद्धालुओं ने यहां पहुंचकर पूजा अर्चना की और अपने परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। मंदिर परिसर में दिनभर श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ाया। राजिम कुम्भ कल्प केवल आध्यात्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक बना। सांस्कृतिक मंच पर प्रतिदिन छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककलाओं की मनमोहक प्रस्तुतियां हुईं। पंथी नृत्य, राउत नाचा, लोकगीत और भक्ति संध्या ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला, जिससे उन्हें नई पहचान और सम्मान प्राप्त हुआ। साथ ही प्रतिष्ठित कलाकारों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को और अधिक भव्य बना दिया। पूरे मेला परिसर में रोशनी, संगीत और उल्लास का अद्भुत वातावरण बना रहा। इस आयोजन ने सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी सकारात्मक प्रभाव डाला। संभागीय सरस मेले में महिला स्व सहायता समूहों ने अपने उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय किया। हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र और स्थानीय व्यंजनों को श्रद्धालुओं ने खूब सराहा। इससे महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनने का अवसर मिला और आत्मनिर्भरता की दिशा में उनका आत्मविश्वास बढ़ा। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई। मेला अवधि के दौरान प्रशासन द्वारा सुरक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल और यातायात की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की गई। श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए हर आवश्यक व्यवस्था की गई, जिससे पूरा आयोजन सुव्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की सक्रिय भूमिका ने आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर इस आयोजन का आध्यात्मिक स्वरूप अपने चरम पर पहुंच गया। नागा साधु संतों का भव्य शाही जुलूस श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। जयघोष, नगाड़ों और धार्मिक ध्वजों के साथ निकले इस जुलूस ने सनातन परंपरा की भव्यता और गौरव को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। नागा संतों के शाही स्नान ने इस आयोजन को और अधिक दिव्यता प्रदान की। अंततः विशेष पूजा, संतों के आशीर्वचन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ राजिम कुम्भ कल्प 2026 का समापन हुआ। यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए केवल एक धार्मिक अनुभव नहीं रहा, बल्कि यह आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा संगम बना, जिसकी स्मृतियां लंबे समय तक लोगों के मन में जीवित रहेंगी। राजिम कुम्भ कल्प ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि सनातन परंपरा केवल एक आस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति है, जो पीढ़ियों से समाज को जोड़ने और मार्गदर्शन देने का कार्य कर रही है।

राजिम कुम्भ कल्प 2026: आस्था, संस्कृति और स्वच्छता का सजीव संगम

  छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम नगरी राजिम में आयोजित राजिम कुम्भ कल्प 2026 इस वर्ष आस्था, संस्कृति और सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं के साथ नई ऊंचाइयों को स्पर्श कर रहा है। पंचकोशी धाम की आध्यात्मिक झलक, जगमगाते घाट, संतों का समागम और स्वच्छता की अनुकरणीय व्यवस्था ने इस महापर्व को विशेष आकर्षण प्रदान किया है। राज्य शासन और जिला प्रशासन द्वारा किए गए सुनियोजित प्रयासों के परिणामस्वरूप मेला परिसर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और प्रेरणादायी वातावरण प्रस्तुत कर रहा है। मुख्य मंच की भव्यता ने खींचा ध्यान राजिम कुम्भ कल्प के मुख्य मंच को इस वर्ष विशेष रूप से आकर्षक स्वरूप दिया गया है। लगभग 60 फीट चौड़े और 80 फीट लंबे इस विशाल मंच की पृष्ठभूमि में पंचकोशी धाम के प्रमुख मंदिरों की सजीव झलक श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति करा रही है। भगवान श्री राजीवलोचन एवं कुलेश्वरनाथ महादेव के साथ पटेश्वरनाथ (पटेवा), चम्पकेश्वरनाथ (चम्पारण), ब्रह्मकेश्वरनाथ (ब्रह्मनी), फणीकेश्वरनाथ (फिंगेश्वर) और कोपेश्वरनाथ (कोपरा) के मंदिरों की प्रतिकृतियां बांस और कपड़े से निर्मित की गई हैं। पारंपरिक शिल्प और आधुनिक साज-सज्जा का यह संतुलित समन्वय मंच को विशिष्ट गरिमा प्रदान कर रहा है। मंच पर स्थापित एलईडी स्क्रीन के माध्यम से कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे दूर बैठे दर्शक भी प्रस्तुति का आनंद ले पा रहे हैं। राज्यस्तरीय इस मंच की भव्यता और कलात्मक प्रस्तुति आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ा रही है। स्वच्छता व्यवस्था बनी प्रेरणा राजिम कुम्भ कल्प 2026 में स्वच्छता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। पूरे मेला क्षेत्र में स्थान-स्थान पर डस्टबीन की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, ताकि कागज, रैपर, पॉलीथीन और प्लास्टिक की बोतलें इधर-उधर न फैलें। सफाई कर्मियों द्वारा नियमित रूप से कचरा संग्रहण और निष्पादन किया जा रहा है, जिससे मेला परिसर स्वच्छ और सुव्यवस्थित बना हुआ है। ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ की संकल्पना का प्रभाव यहां स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। धार्मिक नगरी में बड़ी संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु भी स्वच्छता के प्रति जागरूक दिखाई दे रहे हैं और प्रशासन के प्रयासों में सहयोग कर रहे हैं। सामूहिक सहभागिता के कारण मेला क्षेत्र में स्वच्छ वातावरण बना हुआ है, जो अन्य आयोजनों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। जगमगाते घाट और सुगम व्यवस्थाएं नवीन मेला मैदान चौबेबांधा में नदी तट पर घाट निर्माण का कार्य जारी है। मेला प्रारंभ होने से पूर्व ऊंचे खंभों पर हाईमास्ट लाइटें स्थापित की गई हैं, जिनकी उज्ज्वल रोशनी से रात्रि के समय भी दिन जैसा दृश्य प्रतीत होता है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रकाश व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया है। मेला भ्रमण के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं ने इन व्यवस्थाओं की सराहना की है। उनका कहना है कि वर्तमान में भी परिसर अत्यंत सुंदर और सुव्यवस्थित प्रतीत हो रहा है तथा आगामी आधारभूत संरचनाओं के पूर्ण होने पर यह क्षेत्र और अधिक आकर्षक रूप में विकसित होगा। प्रशासन द्वारा की जा रही दीर्घकालीन योजना इस धार्मिक नगरी को स्थायी रूप से सुसज्जित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कलाकारों को मिल रहा सम्मान और अवसर राजिम कुम्भ कल्प केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी सशक्त मंच है। प्रतिदिन सैकड़ों कलाकार मुख्य मंच, स्थानीय मंच और नदी मंच पर अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय प्रतिभाओं तक को मंच प्रदान कर उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर दिया जा रहा है। प्रस्तुति के उपरांत कलाकारों को प्रमाण पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग द्वारा सांस्कृतिक रुचि रखने वाले शिक्षकों को मंच संचालन और अन्य व्यवस्थाओं से जोड़कर आयोजन में सक्रिय सहभागिता दी गई है। इससे आयोजन में अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा दोनों का संतुलन बना हुआ है। संत समागम से आध्यात्मिक वातावरण राजिम कुम्भ के संत समागम परिसर में देशभर से पहुंचे संत, महामंडलेश्वर और आचार्य विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं। संतों के सानिध्य में आध्यात्मिक वातावरण और अधिक सशक्त हो उठा है। श्रद्धालु सहज रूप से संतों के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। विभिन्न अखाड़ों की सहभागिता और धार्मिक अनुष्ठानों की निरंतरता ने राजिम कुम्भ की पवित्रता को नई आभा प्रदान की है। आस्था, अनुशासन और सांस्कृतिक समन्वय का यह दृश्य राजिम को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिला रहा है। समग्र रूप से राजिम कुम्भ कल्प 2026 आस्था, संस्कृति, स्वच्छता और सुव्यवस्थित प्रशासनिक प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक संरक्षण का भी सशक्त माध्यम बनकर उभर रहा है।

राजिम का पंचमुखी कुलेश्वरनाथ महादेव: मान्यताओं में जीवित माता सीता द्वारा रेत से शिवलिंग निर्माण की परंपरा

छत्तीसगढ़ की पवित्र नगरी राजिम, जिसे श्रद्धालु त्रिवेणी संगम की भूमि के रूप में जानते हैं, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के कारण विशेष महत्व रखती है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम तट पर स्थित पंचमुखी भगवान श्री कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर को आस्था और पौराणिक विश्वासों का केंद्र माना जाता है। स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार यह स्थान भगवान शिव की विशेष कृपा से जुड़ा हुआ माना जाता है। प्राचीन मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मंदिर की संरचना और यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा इसे एक विशेष तीर्थ स्थल बनाती है। मंदिर ऊंचे चबूतरे पर स्थित है, जिसे श्रद्धालु इस बात का प्रतीक मानते हैं कि यह स्थान प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर परिसर में स्थित पीपल के वृक्ष को भी भक्त विशेष श्रद्धा से देखते हैं और इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए विभिन्न दिशाओं से बने मार्ग श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक माने जाते हैं। मान्यता: माता सीता ने रेत से किया था शिवलिंग निर्माण धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण इस क्षेत्र में पहुंचे थे। कहा जाता है कि त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद माता सीता ने भगवान शिव की आराधना के लिए रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और विधि-विधान से पूजा की। जनश्रुति के अनुसार, यह शिवलिंग दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित हुआ और पंचमुखी रूप में पूजनीय माना जाने लगा। तभी से इस स्थान को पंचमुखी कुलेश्वरनाथ महादेव के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। शिव आराधना की पवित्र भूमि के रूप में राजिम की पहचान धार्मिक विश्वासों के अनुसार राजिम क्षेत्र में अनेक प्राचीन शिवलिंग और शिव मंदिर स्थित हैं, जिन्हें भक्त विशेष आस्था के साथ पूजते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि यह क्षेत्र भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र है और यहां दर्शन एवं पूजा करने से आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है। आज भी निभाई जाती है रेत से शिवलिंग बनाने की परंपरा स्थानीय परंपराओं और श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार, माता सीता द्वारा की गई शिव आराधना की स्मृति में आज भी विशेष अवसरों और धार्मिक पर्वों पर भक्त त्रिवेणी संगम में स्नान कर रेत से शिवलिंग का निर्माण करते हैं। इसके बाद जलाभिषेक और पूजा-अर्चना की जाती है। यह परंपरा श्रद्धा और भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखी जाती है। भक्तों का विश्वास है कि इस प्रकार की पूजा से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचमुखी कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर में दर्शन और पूजा करने से भक्तों को आध्यात्मिक संतोष और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। आस्था और परंपरा का जीवंत प्रतीक राजिम का कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर धार्मिक मान्यताओं, जनश्रुतियों और आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। माता सीता द्वारा रेत से शिवलिंग निर्माण की कथा और उससे जुड़ी परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था को मजबूत करती हैं। यह स्थल उन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, जो भगवान शिव की आराधना और प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जुड़कर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं।

राजिम कुम्भ कल्प में मीना बाजार की धूमः 10 एकड़ में सजा सबसे बड़ा मनोरंजन केंद्र

छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम भूमि पर आयोजित राजिम कुम्भ कल्प केवल धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था के साथ-साथ संस्कृति, परंपरा और मनोरंजन का भी भव्य संगम बनकर उभर रहा है। इसी कड़ी में राजिम कुम्भ कल्प मेला क्षेत्र में सजा विशाल मीना बाजार श्रद्धालुओं और मेलार्थियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। लगभग 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह मीना बाजार अपने आकार, विविध मनोरंजन साधनों और आधुनिक झूलों के कारण राजिम कुम्भ की अलग पहचान स्थापित कर रहा है।   देश-विदेश में भले ही कई बड़े और प्रसिद्ध मेले आयोजित होते हों, लेकिन राजिम कुम्भ कल्प के मीना बाजार की भव्यता और विविधता इसे विशिष्ट बनाती है। दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग यहां पहुंच रहे हैं और पूरे परिवार के साथ मनोरंजन का आनंद ले रहे हैं। मेले में आए श्रद्धालुओं ने बताया कि इतना बड़ा और सुव्यवस्थित मीना बाजार कम ही देखने को मिलता है, जहां एक ही स्थान पर रोमांच, श्रद्धा और पारिवारिक मनोरंजन के इतने विकल्प उपलब्ध हों। मीना बाजार में प्रतिदिन सुबह 11 बजे से ही मेलार्थियों की भीड़ जुटना प्रारंभ हो जाती है, जो देर रात 11 बजे तक लगातार बनी रहती है। दिन ढलते ही रोशनी से जगमगाता यह क्षेत्र जीवंत हो उठता है। बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं का उत्साह और बुजुर्गों की उत्सुकता मीना बाजार की लोकप्रियता को स्वतः प्रमाणित कर रही है। यहां लगाए गए आधुनिक और सुरक्षित झूले हर आयु वर्ग के लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। मीना बाजार का सबसे बड़ा आकर्षण 28 चेयर वाला विशाल हवाई झूला है, जिसकी ऊंचाई लगभग 92 फीट बताई जा रही है। ऊंचाई से पूरे मेला क्षेत्र का दृश्य देखने के लिए लोग विशेष रूप से इस झूले का आनंद ले रहे हैं। इसके अलावा नाव झूला, ड्रैगन झूला, टोरा-टोरा, ब्रेक डांस, फ्रीजबी झूला और सुनामी झूला रोमांच के शौकीनों के लिए विशेष आकर्षण बने हुए हैं। लगभग 70 फीट ऊंचा रिवॉल्विंग टावर भी मीना बाजार की शान बढ़ा रहा है, जो ऊपर से नीचे घूमते हुए झूलने वालों को रोमांच से भर देता है।   मीना बाजार में इस वर्ष “स्वीन स्टार झूला” विशेष आकर्षण के रूप में लोगों का ध्यान खींच रहा है। बताया जा रहा है कि यह झूला पूरे भारत में केवल दो स्थानों पर उपलब्ध है, जिनमें से एक राजिम कुम्भ कल्प मेला है। इस झूले का आनंद बच्चे, महिलाएं और पुरुष समान रूप से ले रहे हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। मनोरंजन के साथ-साथ श्रद्धा का भी विशेष ध्यान रखा गया है। इस बार मीना बाजार में वैष्णव देवी की भव्य और आकर्षक झांकी स्थापित की गई है। श्रद्धालु टिकट लेकर माता वैष्णो देवी के दर्शन कर रहे हैं और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त जुरासिक पार्क, भूत बंगला, दो अलग-अलग मौत का कुआं और जलपरी शो भी लोगों के लिए खास आकर्षण बने हुए हैं। जुरासिक पार्क में बच्चों को प्रागैतिहासिक जीवों की झलक मिल रही है, वहीं भूत बंगला और मौत का कुआं रोमांच प्रेमियों को उत्साहित कर रहे हैं। राजिम कुम्भ कल्प मेला का मीना बाजार इस वर्ष हर आयु वर्ग के लोगों का दिल जीतने में सफल हो रहा है। श्रद्धालु जहां दिन में पूजा, स्नान और दर्शन कर आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर रहे हैं, वहीं शाम और रात्रि के समय मीना बाजार में परिवार और मित्रों के साथ मनोरंजन का आनंद उठा रहे हैं। इस तरह राजिम कुंभ कल्प का मीना बाजार आस्था और आनंद के संतुलित संगम के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है।

राजिम कुम्भ कल्प 2026ः महाशिवरात्रि की शाम रामायण फेम अरुण गोविल रहेंगे अतिथि

छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम भूमि पर आयोजित राजिम कुंभ कल्प 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व विशेष आध्यात्मिक गरिमा के साथ मनाया जाएगा। माघ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला यह महापर्व आस्था, साधना और सनातन परंपरा का सजीव प्रतीक माना जाता है। कुंभ कल्प का समापन भी महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर होता है, जिससे इस तिथि का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।   महाशिवरात्रि भगवान शिव की उपासना का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। यह रात्रि तप, साधना, आत्मचिंतन और शिव तत्व के स्मरण की रात्रि मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती से संपन्न हुआ था। राजिम कुंभ कल्प में महाशिवरात्रि शिवभक्ति और आध्यात्मिक चेतना का चरम बिंदु होती है।   महानदी, पैरी और सोंढूर के त्रिवेणी संगम पर महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाएगा। श्रद्धालु पवित्र संगम में स्नान कर भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना करेंगे। रुद्राभिषेक, शिवलिंग पूजन, रात्रिकालीन जागरण एवं भजन-कीर्तन से संपूर्ण मेला क्षेत्र शिवमय वातावरण से ओतप्रोत रहेगा।   महाशिवरात्रि 2026 के अवसर पर राजिम कुंभ कल्प में रामायण फेम अभिनेता अरुण गोविल का आगमन भी आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करेगा। अरुण गोविल भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे लोकप्रिय कलाकारों में से एक हैं, जिन्हें दूरदर्शन के ऐतिहासिक धारावाहिक रामायण में भगवान श्रीराम की भूमिका के लिए देशभर में विशेष पहचान मिली। उनके अभिनय ने करोड़ों दर्शकों के मन में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि को जीवंत किया है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर 15 फरवरी को रात 8 बजे राजिम मेला स्थल पर वे अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।    अरुण गोविल केवल एक अभिनेता ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और सामाजिक चेतना के संवाहक के रूप में भी जाने जाते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा और श्रद्धा का विषय रहती है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर उनका राजिम आगमन कुंभ कल्प की आध्यात्मिक गरिमा को और सशक्त करेगा।   राजिम कुंभ कल्प के दौरान महाशिवरात्रि पर संत समागम भी विशेष रूप से आयोजित होगा। देशभर से आए साधु-संत, नागा साधु और अखाड़ों के संन्यासी शिव साधना, ध्यान और प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को शिव तत्व और सनातन दर्शन से परिचित कराएंगे।   राजिम कुंभ कल्प 2026 में महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और आत्मबोध का महापर्व है। रामायण फेम अरुण गोविल की उपस्थिति के साथ यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव और सांस्कृतिक चेतना का स्मरणीय अवसर सिद्ध होगा।  

राजिम कुम्भ कल्प में संत समागम का महत्त्व

छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम भूमि पर आयोजित होने वाला राजिम कुम्भ कल्प केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, साधना और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इस महापर्व का सबसे महत्वपूर्ण और आत्मिक पक्ष संत समागम है, जो आयोजन को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है। राजिम कुम्भ कल्प के दौरान देशभर से विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत, महामंडलेश्वर, पीठाधीश्वर एवं संत महात्मा त्रिवेणी संगम तट पर एकत्रित होते हैं। यह संत समागम सनातन धर्म की निरंतरता, वैचारिक एकता और आध्यात्मिक अनुशासन का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। संतों की उपस्थिति से कुम्भ कल्प का वातावरण तप, त्याग और साधना से परिपूर्ण हो जाता है। प्रवचन, धर्मसभा, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक संवाद के माध्यम से संतजन श्रद्धालुओं को जीवन मूल्यों, नैतिकता और धर्ममार्ग की प्रेरणा देते हैं। यह समागम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज को दिशा देने का कार्य भी करता है। राजिम कुम्भ कल्प में संत समागम जनसामान्य के लिए दुर्लभ आध्यात्मिक अवसर होता है। श्रद्धालु संतों के सान्निध्य में रहकर आत्मचिंतन, साधना और सेवा के भाव को आत्मसात करते हैं। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और आध्यात्मिक जागरूकता का संचार होता है। संत समागम के माध्यम से छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष मान्यता मिलती है। यह आयोजन प्रदेश की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक समृद्धि को सुदृढ़ करता है तथा सनातन परंपराओं के संरक्षण और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार राजिम कुम्भ कल्प में आयोजित संत समागम आस्था, साधना और सामाजिक चेतना का संगम है, जो न केवल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को भी सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।

छत्तीसगढ़ की लोक गायिका आरू साहू राजिम कुम्भ कल्प 2026 में देंगी प्रस्तुति

छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की समृद्ध परंपरा में आज कई युवा कलाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई है, जिनमें से एक प्रमुख नाम आरू साहू का है। आरू साहू छत्तीसगढ़ की युवा लोक गायिका हैं, जिनकी मधुर आवाज और सांस्कृतिक गीतों की प्रस्तुति ने उन्हें प्रदेश में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति दी है। उनकी कला पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की आत्मा को नए स्वरूप में जीवंत करती है और श्रोताओं को लोक संस्कृति की गहराई से जोड़ती है। राजिम कुम्भ कल्प 2026 में आरू साहू 8 फरवरी को रात 8 बजे अपनी संगीतमयी प्रस्तुति देने जा रही है। आरू साहू, बेहद कम उम्र में ही लोक संगीत के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका में आईं। उनकी सुमधुर गायन शैली और भावपूर्ण प्रस्तुति ने उन्हें युवा वर्ग के साथ-साथ पारंपरिक संगीत प्रेमियों के बीच भी लोकप्रिय किया है। “छत्तीसगढ़िया बेटी” की उपाधि से पहचानी जाने वाली आरू साहू ने कई पारंपरिक छत्तीसगढ़ी गीतों को अपनी आवाज दी है, जिनमें “Karar Karar Tor Mechha He Saga,” “Hariyar Hariyar” और “Mauha Gire Re” जैसे गीत शामिल हैं, जो दर्शकों के बीच अच्छी खासी चर्चित हुए हैं। आरू साहू का संगीत छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा की विविधता को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने करमा, सुवा, ददरिया तथा पंडवानी जैसे पारंपरिक गीतों के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी है, जिनसे दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठते हैं। नगरी में आयोजित विजयदशमी और नवदुर्गा महोत्सव के अवसर पर उनकी प्रस्तुति ने लोक संस्कृति की महक को और भी प्रगाढ़ किया और दर्शकों ने उनके गीतों का भरपूर आनंद लिया। संगीत के क्षेत्र में आरू साहू की सफलता केवल मंच प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने कई प्रतिष्ठित आयोजनों और सांस्कृतिक महोत्सवों में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न सांस्कृतिक मंचों जैसे राज्योत्सव 2025 में भी उनकी प्रस्तुति ने बड़े उत्साह का वातावरण बनाया और लोगों को छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की समृद्धि का अनुभव कराया। सिर्फ लोकगीत प्रस्तुत करना ही नहीं, आरू साहू ने छत्तीसगढ़ी कलाकारों के लिए राष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने मुंबई में आयोजित ‘Born to Shine’ प्रतियोगिता में चयनित होकर टॉप 30 गायकों में स्थान प्राप्त किया और अपनी गायन प्रतिभा से जूरी का ध्यान आकर्षित किया। इस उपलब्धि के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रशंसा और बधाई भी प्राप्त हुई, जिसमें जिला प्रशासन द्वारा भी उनका अभिनंदन किया गया। नववर्ष 2026 में भी आरू साहू की लोकप्रियता ने नई ऊँचाइयाँ छुईं, जब उन्हें डोंगाडुला (सिहावा विधानसभा क्षेत्र) की लोक कला के संरक्षण और प्रचार के लिए “युवा रत्न सम्मान” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान मुख्यमंत्री के हाथों प्रदान किया गया, जो उनके संगीत के प्रति निष्ठा और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संवर्धन के लिए एक मान्यता माना जा रहा है। आरू साहू की उपलब्धियाँ न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा को दर्शाती हैं बल्कि यह भी प्रदर्शित करती हैं कि कैसे युवा कलाकार छत्तीसगढ़ की लोक कला को नयी पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनकी गायन यात्रा ने छत्तीसगढ़ी गीतों को आधुनिक मंचों पर भी मजबूती से स्थापित किया है और लोक संगीत के आने वाले कलाओं को प्रेरणा दी है।

राजिम कुम्भ मेला 2026 में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रेलवे की विशेष पहल

कुम्भ स्पेशल मेमू ट्रेनों का संचालन, “रेल वन ऐप” के प्रचार हेतु विशेष अभियान छत्तीसगढ़ की पावन त्रिवेणी संगम भूमि पर आयोजित राजिम कुम्भ मेला 2026 में श्रद्धालुओं की निरंतर बढ़ती संख्या को देखते हुए भारतीय रेल द्वारा व्यापक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। इस महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के दौरान यात्रियों को यह सुनिश्चित हो सके कि उनकी यात्रा सुगम, सुरक्षित और सुविधाजनक रहे, इसके लिए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर रेल मंडल द्वारा कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। इनमें एक ओर रायपुर से राजिम के बीच कुम्भ स्पेशल मेमू ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “रेल वन ऐप” के प्रचार हेतु विशेष अभियान भी चलाया जा रहा है। राजिम कुम्भ मेला 2026 में प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं की इस भारी आवाजाही को ध्यान में रखते हुए रेलवे प्रशासन ने यात्रा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर विशेष ध्यान दिया है। इसी क्रम में रायपुर रेल मंडल के वाणिज्य विभाग द्वारा “रेल वन ऐप” के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए 1 फरवरी 2026 से 15 फरवरी 2026 तक विशेष अभियान संचालित किया जा रहा है। इस अभियान के अंतर्गत राजिम कुम्भ मेला क्षेत्र में प्रतिदिन सहायता डेस्क एवं हेल्प डेस्क स्थापित की जा रही हैं। इन हेल्प डेस्कों पर रेलवे के वाणिज्य निरीक्षक एवं प्रशिक्षित कर्मचारी यात्रियों को “रेल वन ऐप” डाउनलोड करने की प्रक्रिया, इसके उपयोग की विधि तथा ऐप में उपलब्ध विभिन्न सुविधाओं की विस्तृत जानकारी प्रदान कर रहे हैं। रेल प्रशासन का उद्देश्य है कि यात्री रेलवे से जुड़ी सेवाओं का लाभ एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सरलता और त्वरित रूप से प्राप्त कर सकें। रेलवे अधिकारियों के अनुसार “रेल वन ऐप” यात्रियों के लिए एक समेकित डिजिटल समाधान है। इस ऐप के माध्यम से यात्री टिकट बुकिंग, ट्रेन की लाइव स्थिति की जानकारी, पीएनआर स्टेटस, शिकायत निवारण, रेल मदद, स्टेशन सुविधाओं से जुड़ी जानकारी सहित कई महत्वपूर्ण सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं। राजिम कुंभ जैसे बड़े आयोजन के दौरान इस प्रकार की डिजिटल सुविधा यात्रियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है। इसके साथ ही राजिम कुम्भ मेला 2026 के दौरान श्रद्धालुओं की यात्रा को और अधिक सुगम बनाने के लिए रायपुर-राजिम रेलखंड पर कुम्भ मेला स्पेशल मेमू ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। भारतीय रेल द्वारा इस मार्ग पर कुल दो जोड़ी मेमू कुम्भ मेला स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की गई है, जो 1 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक प्रतिदिन संचालित हो रही हैं। इन ट्रेनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को कम समय में सुरक्षित एवं सुविधाजनक यात्रा का अवसर मिल रहा है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इन विशेष ट्रेनों के संचालन से न केवल श्रद्धालुओं को कुम्भ मेले तक पहुंचने में सुविधा मिल रही है, बल्कि सड़क मार्ग पर बढ़ने वाले यातायात दबाव में भी उल्लेखनीय कमी आ रही है। इससे पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मेमू कुम्भ मेला स्पेशल ट्रेनों की समय-सारणी भी श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तय की गई है। गाड़ी संख्या 08755 रायपुर-राजिम मेमू पैसेंजर रायपुर रेलवे स्टेशन से सुबह 11.55 बजे प्रस्थान कर विभिन्न स्टेशनों से होते हुए दोपहर 13.20 बजे राजिम पहुंचती है। वहीं वापसी में गाड़ी संख्या 08756 राजिम-रायपुर मेमू स्पेशल दोपहर 14.00 बजे राजिम से रवाना होकर 15.30 बजे रायपुर पहुंचती है। इसके अतिरिक्त दूसरी जोड़ी के अंतर्गत गाड़ी संख्या 08757 रायपुर-राजिम मेमू पैसेंजर दोपहर 14.30 बजे रायपुर से प्रस्थान कर शाम 16.00 बजे राजिम पहुंचती है। वापसी में गाड़ी संख्या 08758 राजिम-रायपुर मेमू स्पेशल रात्रि 20.30 बजे राजिम से चलकर 22.00 बजे रायपुर पहुंचती है। राजिम कुम्भ मेला 2026 के दौरान रेलवे द्वारा की गई ये व्यवस्थाएं श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और संतोष को ध्यान में रखते हुए की गई एक महत्वपूर्ण पहल हैं। कुंभ स्पेशल मेमू ट्रेनों का संचालन और “रेल वन ऐप” के माध्यम से डिजिटल सेवाओं का प्रचार इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक तकनीक और सुव्यवस्थित परिवहन व्यवस्था के माध्यम से धार्मिक आयोजनों को और अधिक सुचारु बनाया जा सकता है।

राजिम कुम्भ कल्प 2026 में दंडी महाराज का आगमन

राजिम कुम्भ कल्प 2026 के अवसर पर प्रख्यात संत दंडी महाराज का पावन आगमन हुआ। स्वामीजी ने लगभग 20 वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर में श्री चक्र महामेरु पीठम की स्थापना की थी। उनके श्रद्धालु उन्हें स्नेहपूर्वक “बिलासपुर स्वामीजी” के नाम से संबोधित करते हैं। स्वामीजी का जीवन उद्देश्य वर्तमान भारत में सनातन धर्म को सुदृढ़ रूप से स्थापित करना है, जिससे संपूर्ण मानव जाति का कल्याण सुनिश्चित हो सके। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित श्री चक्र महामेरु पीठम, श्री चक्र पूजा और महामेरु उपासना का एक प्रमुख केंद्र है। ऐतिहासिक रूप से बिलासपुर को ‘विलासपुरी’ के नाम से जाना जाता रहा है और यह क्षेत्र शाक्त उपासना का एक प्राचीन केंद्र माना जाता है। श्री चक्र महामेरु पीठम के संस्थापक एवं पुजारी परम पूज्य श्री श्री सच्चिदानंद तीर्थ महास्वामीगल शंकराचार्य परंपरा के अद्वैत संन्यासी हैं। स्वामीजी ने परम पूज्य श्री श्री ईश्वरानंद तीर्थ महास्वामी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की है और वे कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य के अनन्य भक्त हैं। लगभग दो दशक पूर्व उनके मार्गदर्शन में बिलासपुर में श्री चक्र महामेरु पीठम की स्थापना की गई, जो आज सनातन साधना और आध्यात्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। स्वामीजी के भक्त उन्हें प्रेमपूर्वक “बिलासपुर स्वामीगल” भी कहते हैं। आश्रम में प्रत्येक माह अनुशम के अवसर पर श्री श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती महास्वामीगल (महापेरियावा) की विशेष आराधना की जाती है। इसके अतिरिक्त वार्षिक रूप से भव्य आराधना का आयोजन होता है, जिसमें चंडी होमम संपन्न किया जाता है तथा लगभग 25 हजार श्रद्धालुओं के लिए अन्नदानम की व्यवस्था की जाती है। बिलासपुर स्वामीजी का प्रमुख फोकस स्वामीजी का विशेष ध्यान उन परिवारों के बच्चों पर केंद्रित है, जहां वैदिक विद्वानों की परंपरा रही है, लेकिन बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण वैदिक शिक्षा की निरंतरता प्रभावित हुई है। वे ऐसे बच्चों में वैदिक शिक्षा को पुनर्जीवित करने के लिए सतत प्रयासरत हैं। इसके साथ ही समाज के पिछड़े एवं आदिवासी वर्गों की आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नति के लिए भी वे सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। आश्रम का मिशन श्री चक्र महामेरु पीठम का मूल उद्देश्य कांची कामकोटि पीठम के महास्वामीगल के आदर्शों के अनुरूप सनातन धर्म की रक्षा, संवर्धन और प्रचार करना है। आश्रम के माध्यम से आध्यात्मिक मूल्यों को समाज में स्थापित कर मानवता की सेवा और जागरण को आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है।