राजिम के बारे में

राजिम त्रिवेणी संगमः छत्तीसगढ़ की आस्था का प्रमुख केंद्र

राजिम, गरियाबंद जिला, छत्तीसगढ़ में स्थित अपनी त्रिवेणी संगम- महानदी, पैरी एवं सोंढूर नदियों के पवित्र मिलन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यह संगम हिंदू धर्म में स्वच्छता, पवित्रता और मोक्ष-प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। इसलिए राजिम को “छत्तीसगढ़ का प्रयाग” कहा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे प्रयागराज (इलाहाबाद) को माना जाता है जहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम होता है। स्थानीय परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र संगम में स्नान करने से जीवन के पाप धुलते हैं और व्यक्ति को आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।

प्राचीन मंदिर और धार्मिक महत्व
राजिम का धार्मिक महत्व मंदिरों के कारण भी अत्यंत बढ़ जाता है। यहाँ स्थित श्री राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जिसकी स्थापत्य शैली और शिलालेख इतिहासकारों को 8वीं सदी का संदर्भ प्रदान करते हैं। यह मंदिर विस्तृत नक्काशियों और धार्मिक शिल्पकला के लिए विख्यात है। इसी प्रकार कुलेश्वर महादेव मंदिर त्रिवेणी संगम के मध्य स्थित है और शिवभक्तों के लिए एक प्रमुख पूजा स्थल है। इन दोनों मंदिरों के अलावा राजिम में और भी कई छोटे-बड़े पवित्र स्थल हैं जहाँ भक्त वर्षभर आशीर्वाद लेने आते हैं।

राजिम कुंभ कल्पः आयोजन की रूपरेखा और धार्मिक प्रथा
राजिम कुंभ कल्प एक धार्मिक आयोजन है, जो प्रतिवर्ष माघी पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक लगभग 15 दिनों तक चलता है। इस आयोजन के दौरान हजारों साधु-संत, महात्मा, ऋषि, मुनि, मार्गदर्शक गुरुओं और श्रद्धालुओं का भव्य समागम होता है। यह आयोजन पारंपरिक कुंभ मेलों से प्रेरित है- जैसे हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में लगने वाले कुंभ मेले, लेकिन राजिम कुंभ को स्थानीय रूप से “पांरपरिक पुन्नी मेला” की तर्ज पर मनाया जाता है।

आयोजन की खासियत यह है कि श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान करते हैं, भक्ति-कीर्तन और पूजा-अनुष्ठान में भाग लेते हैं तथा मंदिरों में विशेष आराधना करते हैं। यहाँ शाही स्नान के अलावा कलश यात्रा और विशेष पूजा कार्यक्रम भी होते हैं जिसमें महिलाएं कलश लेकर नदी तक जाती हैं और फिर उसे मंदिर में लौटाती हैं, जो समर्पण तथा श्रद्धा की एक सुंदर परंपरा है।

सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम
राजिम कुंभ सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक भी है। मेले के दौरान लोक संगीत, नृत्य, भजन-कीर्तन, संगोष्ठियाँ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आयोजित होती हैं, जो छत्तीसगढ़ की पारंपरिक विरासत को जीवंत रूप से दिखाती हैं। सामाजिक रूप से यह आयोजन विभिन्न समुदायों को एक साथ जोड़ने और मानवता, सांस्कृतिक एकता तथा परस्पर सम्मान का संदेश फैलाने में मदद करता है।

आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तजनों का समागम
राजिम कुंभ कल्प में देशभर से साधु-संत, नागा संत, रूद्रभक्त एवं महात्मा आते हैं। ये अपने-अपने अनुयायियों के साथ धार्मिक प्रवचन, आरती, ध्यान, उपदेश और भजन-कीर्तन करते हैं, जिससे आयोजन को एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार मिलता है। श्रद्धालु रात्री समय विशेष पूजा में भाग लेते हैं तथा दिनभर के कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर आत्मा-शुद्धि का अनुभव करते हैं।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपरा
राजिम कुंभ कल्प छत्तीसगढ़ के धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह आयोजन न केवल राज्य के लोगों की आस्था का केंद्र है बल्कि अब यह देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी एक आकर्षण बन चुका है। छत्तीसगढ़ सरकार भी इसे सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में प्रोत्साहित कर रही है जिससे यह आयोजन राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है।