राजिम कुम्भ कल्प 2026 के अवसर पर प्रख्यात संत दंडी महाराज का पावन आगमन हुआ। स्वामीजी ने लगभग 20 वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर में श्री चक्र महामेरु पीठम की स्थापना की थी। उनके श्रद्धालु उन्हें स्नेहपूर्वक “बिलासपुर स्वामीजी” के नाम से संबोधित करते हैं। स्वामीजी का जीवन उद्देश्य वर्तमान भारत में सनातन धर्म को सुदृढ़ रूप से स्थापित करना है, जिससे संपूर्ण मानव जाति का कल्याण सुनिश्चित हो सके।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित श्री चक्र महामेरु पीठम, श्री चक्र पूजा और महामेरु उपासना का एक प्रमुख केंद्र है। ऐतिहासिक रूप से बिलासपुर को ‘विलासपुरी’ के नाम से जाना जाता रहा है और यह क्षेत्र शाक्त उपासना का एक प्राचीन केंद्र माना जाता है। श्री चक्र महामेरु पीठम के संस्थापक एवं पुजारी परम पूज्य श्री श्री सच्चिदानंद तीर्थ महास्वामीगल शंकराचार्य परंपरा के अद्वैत संन्यासी हैं।
स्वामीजी ने परम पूज्य श्री श्री ईश्वरानंद तीर्थ महास्वामी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की है और वे कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य के अनन्य भक्त हैं। लगभग दो दशक पूर्व उनके मार्गदर्शन में बिलासपुर में श्री चक्र महामेरु पीठम की स्थापना की गई, जो आज सनातन साधना और आध्यात्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
स्वामीजी के भक्त उन्हें प्रेमपूर्वक “बिलासपुर स्वामीगल” भी कहते हैं। आश्रम में प्रत्येक माह अनुशम के अवसर पर श्री श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती महास्वामीगल (महापेरियावा) की विशेष आराधना की जाती है। इसके अतिरिक्त वार्षिक रूप से भव्य आराधना का आयोजन होता है, जिसमें चंडी होमम संपन्न किया जाता है तथा लगभग 25 हजार श्रद्धालुओं के लिए अन्नदानम की व्यवस्था की जाती है।
बिलासपुर स्वामीजी का प्रमुख फोकस
स्वामीजी का विशेष ध्यान उन परिवारों के बच्चों पर केंद्रित है, जहां वैदिक विद्वानों की परंपरा रही है, लेकिन बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण वैदिक शिक्षा की निरंतरता प्रभावित हुई है। वे ऐसे बच्चों में वैदिक शिक्षा को पुनर्जीवित करने के लिए सतत प्रयासरत हैं। इसके साथ ही समाज के पिछड़े एवं आदिवासी वर्गों की आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नति के लिए भी वे सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
आश्रम का मिशन
श्री चक्र महामेरु पीठम का मूल उद्देश्य कांची कामकोटि पीठम के महास्वामीगल के आदर्शों के अनुरूप सनातन धर्म की रक्षा, संवर्धन और प्रचार करना है। आश्रम के माध्यम से आध्यात्मिक मूल्यों को समाज में स्थापित कर मानवता की सेवा और जागरण को आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है।