छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर स्थित राजिम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति और अध्यात्म के अद्भुत संगम का प्रतीक है। यहां हर वर्ष आयोजित होने वाला राजिम कुम्भ कल्प नदियों की कल-कल ध्वनि, रेत की विस्तृत धाराओं, हरियाली से घिरे और खुले नीले आकाश के बीच मानव जीवन को आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है।
राजिम में महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। यह संगम स्थल अपने आप में अत्यंत मनोहारी है। दूर तक फैली रेत, बहती नदियों की शीतल धाराएं और आसपास की प्राकृतिक हरियाली श्रद्धालुओं को एक अलग ही लोक में ले जाती हैं। जब माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक कुम्भ कल्प का आयोजन होता है, तब यह पूरा क्षेत्र एक विशाल आध्यात्मिक परिसर में परिवर्तित हो जाता है।
प्राकृतिक वातावरण में आयोजित यह कुंभ कल्प साधना और शांति का विशेष अनुभव कराता है। खुले आकाश के नीचे संतों की प्रवचन सभाएं, अखाड़ों की परंपरागत गतिविधियां और कल्पवासियों की साधना- सब कुछ प्रकृति के सान्निध्य में होता है। यहां कोई भव्य भवन नहीं, बल्कि प्रकृति ही सबसे बड़ा मंदिर बन जाती है। यही सादगी राजिम कुंभ कल्प की सबसे बड़ी विशेषता है।
संगम तट पर स्थित प्राचीन राजीव लोचन विष्णु मंदिर इस आयोजन का केंद्र बिंदु है। माना जाता है कि यह मंदिर 8वीं-9वीं शताब्दी का है और इसकी वास्तुकला भी प्रकृति के अनुरूप ही विकसित हुई है। मंदिर के आसपास बहती नदियां और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को ध्यान और आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है।
राजिम कुम्भ कल्प में देशभर से संत-महात्मा, नागा साधु और अखाड़े आते हैं। लेकिन यह आयोजन केवल साधु-संतों तक सीमित नहीं रहता। बड़ी संख्या में आम श्रद्धालु, ग्रामीण और आदिवासी समुदाय भी इसमें भाग लेते हैं। संगम में स्नान कर, खुले मैदान में बैठकर भजन-कीर्तन सुनना और प्रकृति की गोद में समय बिताना लोगों को मानसिक शांति प्रदान करता है।
इस कुंभ कल्प के दौरान छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति भी पूरी जीवंतता के साथ दिखाई देती है। लोकनृत्य, भजन, पंथी और जसगीत की प्रस्तुतियां प्राकृतिक मंच पर होती हैं, जहां न तो कृत्रिम रोशनी का दिखावा होता है और न ही शोर-शराबा, बस प्रकृति की सहज लय के साथ संस्कृति का प्रवाह।