About Rajim Mahakumbh

राजिम महाकुंभ: छत्तीसगढ़ का प्रयाग जहां बरसेगा भक्ति का अमृत

आस्था की रोशनी जब एक साथ लाखों हृदयों में उतरती है तब उसे कुंभ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इतिहास की चेतना से परे ये अनुभव जीवंत होते हैं राजिम के त्रिवेणी संगम पर। हमारा भारतीय मन इस त्रिवेणी पर अपने भीतर पवित्रता का वह स्पर्श पाता है जो जीवन की सार्थकता को रेखांकित करता है। छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक नगरी राजिम में गंगा, यमुना, सरस्वती स्वरूपा पवित्र महानदी, सोंढूर और पैरी के त्रिवेणी संगम पर भगवान राजीव लोचन, माता सीता द्वारा पूजित कुलेश्वर महादेव और लोमष ऋषि के आश्रम हैं। यह स्थान प्रभु श्री राम के वन गमन का भी मार्ग है। प्राचीन काल से त्रिवेणी संगम पर बसे इस तीर्थ में तर्पण, शुद्धि और मोक्ष के अन्य उपक्रम विश्वास के साथ संपन्न होते रहे हैं और अब अनादि काल से चले आ रहे परंपरा और आस्था के इस पर्व ने कुंभ का रूप ले लिया है।

आरम्भ

वर्ष 2006 में मंदिरों की महानगरी और जीवनदायिनी महानदी, पैरी और सोंढूर के त्रिवेणी संगम पर बसे पवित्र नगरी राजिम में प्राचीन काल से आयोजित होने वाले मेले ने तत्कालीन संस्कृति मंत्री माननीय श्री बृजमोहन अग्रवाल के प्रयासों के फलस्वरुप कुंभ का आकर लिया। माना जाता है कि राजिम में स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान् राजीव लोचन जी के मंदिर कोस्वयं भगवान् विष्णु के आदेश पर भगवान् विश्वकर्मा द्वारा स्थापित किया गया था। इसके धार्मिक महत्व के कारण अनंत काल से प्रतिवर्ष यहां माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता रहा है।

स्वयं भगवान् द्वारा निर्मित इस धर्मस्व नगरी को इसके धार्मिक महत्व के कारण संतों का आशीर्वाद मिला और तत्पश्चात इसे पांचवें कुंभ का दर्जा प्रदान किया गया। इसी के साथ देश में लघु प्रयाग के रूप में सुविख्यात राजिम में हर साल कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, जिसने 12 वर्ष पूर्ण कर अब महा कुंभ का आकार ले लिया हैI और इसके कल्पेश हैं, छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री बृजमोहन अग्रवाल।.

जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज ने कुंभ के संदर्भ में कहा है, ''सच्चा कुंभ वही है जहां महापुरुषों के मुख से कथा निकलती है एवं छत्तीसगढ़ सरकार ने राजिम कुंभ का आयोजन कर पूरे देश में एक आदर्श प्रस्तुत किया है और दूसरे राज्यों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए''I उन्होंने धर्मस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के प्रति यह आयोजन करने के लिए प्रसन्नता जाहिर कर आगे भी धर्म-संस्कृति की इसी तरह सेवा करते रहने का आशीर्वाद दिया हैI

इस वर्ष 10 फरवरी से 24 फरवरी तक छत्तीसगढ़ के प्रयाग में बरसेगा भक्ति का अमृत, स्वर्ग के देवता आकाश से करेंगे पुष्पवर्षा और जब चारों ओर 'हर-हर महादेव' का नाद एक स्वर में गुंजायमान होगा तभी आस्था की शक्ति से ओत-प्रोत आत्मा का परमात्मा से होगा मिलन। शंकराचार्यों, संत-महात्माओं, महामंडलेश्वरों के सानिध्य में प्रदेश के प्रयागराज में लगातार उमड़ता जन सैलाब राजिम कुंभ की लोक व्याप्ति की अभिव्यक्ति है। इस वर्ष तकरीबन 50 लाख लोगों के कुंभ में शामिल होकर इस महामिलन के साक्षी बनने की उम्मीद है।

पौराणिक कथा

सतयुग के समय की बात है, राजा रत्नाकर बहुत श्रद्धालु प्रवृत्ति के राजा थे और धर्म-कर्म में लगे रहते थेI एक बार वे यज्ञ कर रहे थे और उसमें राक्षसों ने विघ्न डाल दिया। वे उन्हें रोक नहीं सके और दुखी होकर भगवान की प्रार्थना करने लगेI ठीक उसी समय राजा के हाथी गजेन्द्र को ग्राह नामक मगरमच्छ ने पकड़ लियाI हाथी ने जब सहायता के लिए भगवान विष्णु को पुकारा तो भगवान विष्णु नंगे पांव दौड़े चले आएI हाथी को बचाने के बाद वे उसी अवस्था में राजा की पुकार सुन हवन कुण्ड में अवतरित हो गएI राजा को यह वरदान भी मिल गया कि अब भगवान विष्णु "राजीव लोचन" के रूप में सदा यहां विराजमान रहेंगेI यहां विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति में भगवान के पैरों में चरण पादुका नहीं है और उनका बायां हाथ सुदर्शन चक्र के साथ इस तरह झुका हुआ है मानो उन्होंने उसका अभी-अभी किसी पर प्रयोग किया है।

छत्तीसगढ़ का मानस अपनी तरह से इस कुम्भ को सदियों से जीता रहा है। राजिम में असंख्य संतों और साधुओं का एकत्र होना, उनका आपस में गूढ़ सूत्रों पर विचार-विमर्श और सामान्य लोगों से उनका साक्षात्कार ही इस अवसर को कुम्भ बनाता है। यहां साधु-संतों की निरंतर उपस्थिति से अपने आप ही पवित्रता का एक आलोक उभरता है।

भव्य राजीव लोचन मंदिर

राजिम का मुख्य आकर्षण तथा राजिम कुंभ का आधार राजीव लोचन मंदिर, आयताकार क्षेत्र के मध्य स्थित है। मंदिर के चारों कोणों में श्री वाराह अवतार, नृसिंह अवतार तथा बद्रीनाथ जी के धाम हैं। उत्तर तथा दक्षिण में प्रवेश द्वार बने हुए हैं।

राजिम तेलिन सती मंदिर के गर्भ गृह की शिलाएं भी जनश्रुतियों की पुष्टि करती हैं। एक शिलापट्ट ऊंची वेदी पर पृष्ठ भूमि से लगा हुआ है। इस पर खुली हथेली, सूर्य, चंद्र और पूर्ण कुंभ की आकृति विद्यमान है। नीचे एक पुरुष और स्त्री की आमने-सामने पद्मासन मुद्रा में प्रतिमा है और दोनों के पीछे एक-एक परिचारिका की मूर्ति है। शिलापट्ट के मध्य में जुते बैलयुक्त कोल्हू का शिल्पांकन है। राजीव लोचन मंदिर के ठीक सामने दान-दानेश्वर मंदिर है। पूरी पृथ्वी पर ऐसे मंदिर दुर्लभ ही हैं, जहां शिव और विष्णु के मंदिर ठीक आमने-सामने हों।

राजिम से जुड़ी है कई लोकोक्तियां

संस्कार और संस्कृति की धरती राजिम में राजीव लोचन और कुलेश्वर महादेव के रूप में साक्षात् भगवान विष्णु और देवों के देव महादेव न जाने कब से विराजे हुए हैं। माना जाता है कि वर्षा काल में महानदी जितने भी उफान पर हो कुलेश्वर महादेव के चरणों को स्पर्श करते ही शांत होने लगती है। महानदी को चित्रोत्पला गंगा के नाम से भी विभूषित किया गया है।

इसका उद्गम सिहावा की पहाड़ी से हुआ है। महाभारत के भीष्म पर्व में लिखा गया है कि आरम्भ में उत्पलेश्वर महादेव और अंतिम छोर में चित्रा-माहेश्वरी देवी स्थित है। चित्रोत्पला नदी पुण्य दायिनी और पाप नाशिनी कही जाती है। तीन नदियों के मिलन होने के कारण यह स्थान प्रयाग (इलाहाबाद) के त्रिवेणी संगम के समान पवित्र एवं शास्त्र सम्मत माना जाता है।

प्रचलित लोकोक्ति के अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने विश्वकर्मा जी से कहा कि धरती पर वे एक ऐसी जगह उनके मंदिर का निर्माण करें, जहां पांच कोस के अंदर किसी का शव न जला हो। आदेश पालन के लिए विश्वकर्मा जी धरती पर ऐसा स्थान ढूंढ़ते रहे, पर ऐसा कोई स्थान उन्हें मिला ही नहीं। उन्होंने वापस जाकर जब विष्णु भगवान को बताया तो भगवान विष्णु जी ने स्वर्ग से कमल का एक फूल धरती पर गिरा दिया और विश्वकर्मा जी से कहा कि यह पद्म जहां गिरेगा, वहीं हमारे मंदिर का निर्माण होगा। इस प्रकार कमल फूल के पराग पर भगवान विष्णु के मंदिर (राजीव लोचन मंदिर) का निर्माण हुआ और उसकी पंखुड़ियों पर पंचकोसी धाम - कुलेश्वरनाथ (राजिम), चम्पेश्वरनाथ (चम्पारण्य), ब्रह्मकेश्र्वरनाथ (ब्रम्हाणी), पांडेश्वरनाथ (फिंगेश्वर) तथा कोपेश्वरनाथ (कोपरा) विराजमान हैं।

लोकमान्यता है कि राजिम के निकट स्थित पद्म सरोवर में स्नान करने से शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। पौराणिक काल में इस क्षेत्र का नाम पद्मपुर था जो मोक्ष धाम के रूप में विख्यात है।

नागा साधु प्रदान करते हैं विशेष गरिमा

छत्तीसगढ़ के इस प्रयाग में पवित्रता का निरंतर संधान हो रहा है और नागा संतों की उपस्थिति राजिम कुंभ को एक विशेष गरिमा देती है। वे सभी संत जो जीवन को सार्थकता की राह दिखाने के लिए साधनारत होते हैं, यहां वे सामान्य लोगों के लिए अमृत वचनों की वर्षा करते हैं। अमृत संधान, श्रद्धा के सैलाब और भक्ति की लहरों के बीच उठता है एक महत्वपूर्ण अनुभव जो हमारे जीवन को भीगो देता है और हम जीवन के एक नए अर्थ को पाते हैं। वास्तव में यही वो क्षण होता है जब अमृत कलश की बूंदें धरती पर आ जाती है।